कानपुर में सवर्ण समाज लामबंद, UGC कानून और जातिगत आरक्षण के विरोध में बना ‘सवर्ण एकता मोर्चा’

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Digital UP News Desk

कानपुर। प्रस्तावित यूजीसी कानून और जातिगत आरक्षण व्यवस्था को लेकर कानपुर में सवर्ण समाज के विभिन्न संगठनों ने एकजुट होकर ‘सवर्ण एकता मोर्चा’ के गठन का ऐलान किया है। क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य और कायस्थ समाज समेत कई संगठनों के पदाधिकारियों ने संयुक्त प्रेस वार्ता कर प्रस्तावित कानून पर अपनी आपत्तियां जाहिर कीं। साथ ही आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा कर इसे आर्थिक आधार पर लागू किए जाने की मांग उठाई गई।

सवर्ण एकता मोर्चा के पदाधिकारियों ने कहा कि प्रस्तावित यूजीसी कानून को लेकर समाज के बीच चिंता है। उनका कहना है कि शिक्षा व्यवस्था से जुड़े किसी भी कानून का असर सीधे विद्यार्थियों और उनके भविष्य पर पड़ता है। इसलिए ऐसे प्रावधानों पर व्यापक चर्चा और सभी वर्गों के हितों को ध्यान में रखकर निर्णय लिया जाना चाहिए।

विभिन्न सवर्ण संगठनों ने एक मंच पर आने का किया ऐलान

कानपुर में आयोजित संयुक्त प्रेस वार्ता में अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के प्रदेश अध्यक्ष मनोज कुमार सिंह भदौरिया और सर्व ब्राह्मण विकास परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष पं. कमल किशोर अवस्थी ने सवर्ण एकता मोर्चा के गठन की जानकारी दी। इस दौरान वैश्य एकता परिषद, कायस्थ महासभा और सवर्ण समाज से जुड़े अन्य संगठनों के वरिष्ठ पदाधिकारी भी मौजूद रहे।

पदाधिकारियों ने कहा कि अलग-अलग संगठनों की अपनी गतिविधियां हैं, लेकिन शिक्षा और आरक्षण जैसे व्यापक मुद्दों को लेकर सभी को एक मंच पर आने की आवश्यकता महसूस हुई। इसी उद्देश्य से सवर्ण एकता मोर्चा का गठन किया गया है।

उनका कहना है कि मोर्चा आगे चलकर विभिन्न जिलों और तहसीलों में सवर्ण समाज के संगठनों को जोड़ने का प्रयास करेगा। इसके माध्यम से प्रस्तावित यूजीसी कानून और आरक्षण व्यवस्था को लेकर अपनी मांगों को लोकतांत्रिक तरीके से सरकार तक पहुंचाया जाएगा।

प्रस्तावित यूजीसी कानून पर जताई आपत्ति

प्रेस वार्ता के दौरान सवर्ण संगठनों के पदाधिकारियों ने प्रस्तावित यूजीसी कानून पर सवाल उठाए। उन्होंने इसे विद्यार्थियों और शिक्षा व्यवस्था के हितों से जुड़ा विषय बताते हुए कहा कि किसी भी नए कानून को लागू करने से पहले उसके संभावित प्रभावों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।

पदाधिकारियों ने कहा कि उनका विरोध लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से रहेगा। उन्होंने सरकार से मांग की कि प्रस्तावित यूजीसी कानून के संबंध में सवर्ण समाज की चिंताओं पर भी विचार किया जाए और सभी पक्षों से संवाद किया जाए।

मोर्चे के पदाधिकारियों ने कहा कि शिक्षा देश के युवाओं के भविष्य से जुड़ी हुई है। इसलिए शिक्षा व्यवस्था में होने वाले किसी भी बड़े बदलाव को लेकर विद्यार्थियों, अभिभावकों और विभिन्न सामाजिक संगठनों की चिंताओं को सुनना जरूरी है।

आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग

प्रेस वार्ता में आरक्षण व्यवस्था को लेकर भी सवर्ण संगठनों ने अपनी मांग रखी। उनका कहना है कि वर्तमान आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा की जानी चाहिए और सामाजिक न्याय के साथ-साथ आर्थिक स्थिति को भी महत्वपूर्ण आधार बनाया जाना चाहिए।

सवर्ण एकता मोर्चा के पदाधिकारियों ने मांग की कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के विद्यार्थियों को उनकी जाति से अलग आर्थिक स्थिति के आधार पर अवसर मिलना चाहिए। उनका तर्क है कि समाज के प्रत्येक वर्ग में आर्थिक रूप से कमजोर परिवार मौजूद हैं, इसलिए सरकारी योजनाओं और अवसरों का लाभ आर्थिक जरूरत के आधार पर भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

उन्होंने जातिगत आरक्षण की समीक्षा की मांग करते हुए कहा कि सरकार को इस विषय पर व्यापक स्तर पर चर्चा करनी चाहिए। हालांकि, आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर संवैधानिक प्रावधानों और न्यायिक व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए आगे की नीति तय किए जाने की आवश्यकता है।

1 सितंबर को राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन

सवर्ण एकता मोर्चा ने आंदोलन के अगले चरण की भी घोषणा की है। पदाधिकारियों के मुताबिक 1 सितंबर, मंगलवार को सवर्ण समाज के विभिन्न संगठन एक साथ होकर जिलाधिकारी के माध्यम से राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को संबोधित ज्ञापन सौंपेंगे।

ज्ञापन के माध्यम से प्रस्तावित यूजीसी कानून को लेकर अपनी आपत्तियां और आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा की मांग सरकार तक पहुंचाई जाएगी। संगठन का कहना है कि यह कार्यक्रम शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से आयोजित किया जाएगा।

मोर्चे के पदाधिकारियों ने कहा कि ज्ञापन के माध्यम से सरकार से अपनी मांगों पर विचार करने का आग्रह किया जाएगा। इसके बाद सरकार की ओर से मिलने वाली प्रतिक्रिया के आधार पर आंदोलन की आगे की रणनीति तय की जाएगी।

मांगें नहीं मानी गईं तो आंदोलन विस्तार की चेतावनी

सवर्ण एकता मोर्चा ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि ज्ञापन के बाद उनकी मांगों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं होती है तो आंदोलन का दायरा बढ़ाया जाएगा। पदाधिकारियों के अनुसार पहले इसे जिला स्तर पर मजबूत किया जाएगा। इसके बाद प्रदेश की विभिन्न तहसीलों और जिलों तक अभियान को पहुंचाने की योजना है।

उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ने पर आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर तक ले जाया जाएगा। दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना देने की संभावना भी जताई गई है। पदाधिकारियों ने कहा कि उनकी मांगों पर सरकार की ओर से सकारात्मक आश्वासन मिलने तक वे लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज उठाते रहेंगे।

हालांकि, संगठन ने यह भी कहा कि आंदोलन का उद्देश्य अपनी मांगों को सरकार तक शांतिपूर्ण तरीके से पहुंचाना है। इसके लिए ज्ञापन, बैठक और लोकतांत्रिक कार्यक्रमों का सहारा लिया जाएगा।

2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर भी दिया संदेश

प्रेस वार्ता में जब पदाधिकारियों से आगामी 2027 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि सरकार को उनकी मांगों को गंभीरता से लेना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि यदि उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया तो इसका राजनीतिक असर भी देखने को मिल सकता है।

पदाधिकारियों ने कहा कि सवर्ण समाज के विभिन्न संगठनों की ओर से अपनी मांगों को लेकर सरकार के सामने बात रखी जा रही है। यदि मांगों पर कोई सकारात्मक पहल नहीं होती है तो चुनाव के समय इस मुद्दे को समाज के बीच ले जाने पर भी विचार किया जा सकता है।

हालांकि, चुनाव को लेकर अंतिम रणनीति भविष्य में परिस्थितियों के आधार पर तय किए जाने की बात कही गई।

कई संगठनों के पदाधिकारी रहे मौजूद

संयुक्त प्रेस वार्ता और बैठक में सवर्ण समाज से जुड़े कई संगठनों के पदाधिकारी मौजूद रहे। कार्यक्रम में प्रदेश अध्यक्ष पं. कौशल किशोर अवस्थी, प्रदेश महामंत्री धीरेंद्र सिंह, मंडल अध्यक्ष महेंद्र तोमर, जिलाध्यक्ष संजीव मिश्रा और महामंत्री दिनेश पाण्डेय समेत कई पदाधिकारियों ने हिस्सा लिया।

बैठक में प्रस्तावित यूजीसी कानून, आरक्षण व्यवस्था और संगठन की आगामी रणनीति पर चर्चा की गई। पदाधिकारियों ने कहा कि आने वाले दिनों में मोर्चे की गतिविधियों को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाया जाएगा।

आगे की रणनीति पर रहेगी नजर

कानपुर में सवर्ण समाज के विभिन्न संगठनों का एक मंच पर आना स्थानीय स्तर पर महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। अब सभी की नजर 1 सितंबर को होने वाले ज्ञापन कार्यक्रम पर रहेगी। इसके साथ ही यह भी महत्वपूर्ण होगा कि सरकार की ओर से इन मांगों पर क्या प्रतिक्रिया सामने आती है।

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