कानपुर के बीएनएसडी शिक्षा निकेतन में सजा सावन का रंग, कजरी उत्सव में लोकसंस्कृति की दिखी मनोहारी झलक
रिपोर्ट – विक्की रघुवंशी
कानपुर: बेनाझावर स्थित बी.एन.एस.डी. शिक्षा निकेतन में सावन की लोकपरंपरा, लोकसंगीत और भारतीय सांस्कृतिक विरासत को समर्पित ‘कजरी उत्सव’ का भव्य एवं मनोहारी आयोजन किया गया। कार्यक्रम में विद्यालय की छात्राओं, शिक्षिकाओं और आमंत्रित लोक कलाकारों ने कजरी गायन, लोकनृत्य तथा सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से सावन के उल्लास और ग्रामीण लोकजीवन की सुंदर तस्वीर मंच पर प्रस्तुत की।
कार्यक्रम के दौरान विद्यालय परिसर में लोकगीतों और पारंपरिक संगीत की गूंज सुनाई दी। वहीं, छात्राओं की मनमोहक प्रस्तुतियों ने उपस्थित अभिभाविकाओं और अतिथियों का मन मोह लिया। बड़ी संख्या में अभिभाविकाओं की मौजूदगी ने आयोजन की गरिमा को और बढ़ा दिया।
विद्यालय की ओर से आयोजित इस उत्सव का उद्देश्य विद्यार्थियों को भारतीय लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराना तथा उन्हें अपनी जड़ों से जोड़ना रहा।
दीप प्रज्वलन के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ
कजरी उत्सव का शुभारंभ मुख्य अतिथि के आगमन और दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इसके बाद विद्यालय की उप प्रधानाचार्या श्रीमती मंजूबाला श्रीवास्तव ने अतिथियों और उपस्थित अभिभाविकाओं का स्वागत किया।
अपने स्वागत संबोधन में उन्होंने कजरी लोकगीत की सांस्कृतिक और पारंपरिक महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि सावन से जुड़े लोकगीत भारतीय ग्रामीण जीवन, प्रकृति और सामाजिक परंपराओं की भावनाओं को सहज रूप से अभिव्यक्त करते हैं।
इसके बाद विद्यार्थियों और शिक्षिकाओं की सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का सिलसिला शुरू हुआ। एक के बाद एक प्रस्तुतियों ने पूरे वातावरण को सावन के रंग में रंग दिया।
‘घेरि-घेरि आई सावन की बदरिया ना’ ने बांधा समां
कार्यक्रम में कक्षा षष्ठ और सप्तम के विद्यार्थियों ने ‘घेरि-घेरि आई सावन की बदरिया ना’ कजरी की मनमोहक प्रस्तुति दी। विद्यार्थियों के गायन और प्रस्तुति ने वातावरण में सावन की पारंपरिक अनुभूति को जीवंत कर दिया।
कजरी गीत के माध्यम से बादलों, बारिश और सावन से जुड़ी ग्रामीण स्मृतियों को सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया। दर्शकों ने विद्यार्थियों की प्रस्तुति की सराहना की और उनका उत्साहवर्धन किया।
इसके पश्चात कक्षा द्वादश की छात्राओं ने सामूहिक नृत्य प्रस्तुत किया। ताल और संगीत के सुंदर समन्वय के साथ छात्राओं की प्रस्तुति ने कार्यक्रम में नई ऊर्जा भर दी।
बुंदेलखंड की कजरी और झूला संस्कृति ने मोहा मन
कक्षा द्वादश की छात्राओं ने बुंदेलखंड की सावन कजरी और झूला प्रस्तुति के माध्यम से क्षेत्र की समृद्ध लोकपरंपरा को मंच पर जीवंत किया। प्रस्तुति में ग्रामीण जीवन, सावन का उल्लास और पारंपरिक झूला संस्कृति की सुंदर झलक देखने को मिली।
भारतीय लोक संस्कृति में सावन का विशेष महत्व रहा है। इस मौसम में गांवों में झूले पड़ने, लोकगीत गाने और सामूहिक रूप से उत्सव मनाने की परंपरा रही है। छात्राओं ने अपनी प्रस्तुति के माध्यम से इसी सांस्कृतिक स्मृति को दर्शकों के सामने रखा।
इस प्रस्तुति ने न केवल मनोरंजन किया, बल्कि विद्यार्थियों और दर्शकों को भारतीय लोकजीवन की समृद्ध परंपराओं से जोड़ने का भी काम किया।
शिक्षिकाओं की प्रस्तुतियों ने बढ़ाई कार्यक्रम की गरिमा
कजरी उत्सव में विद्यालय की शिक्षिकाओं ने भी उत्साहपूर्वक भाग लिया। शिक्षिका श्रीमती चंद्रिका जी ने पारंपरिक कजरी ‘कइसे खेलन जइयो सावन में कजरिया’ का सुमधुर गायन प्रस्तुत किया।
उनकी प्रस्तुति ने उपस्थित श्रोताओं को लोकसंगीत की भावपूर्ण दुनिया से जोड़ दिया। पारंपरिक कजरी की मधुर धुन और भावपूर्ण गायन ने कार्यक्रम को विशेष रंग प्रदान किया।
इसके बाद शिक्षिका श्रीमती ऋचा जी ने एकल नृत्य प्रस्तुत किया। उनके नृत्य में संगीत, भाव और कलात्मकता का सुंदर समन्वय देखने को मिला। प्रस्तुति ने कार्यक्रम के सांस्कृतिक स्वरूप को और समृद्ध किया।
लोकगायिका कविता सिंह की प्रस्तुति रही विशेष आकर्षण
कजरी उत्सव का विशेष आकर्षण गुरुकुल संगीत विद्यापीठ की निदेशक और सुप्रसिद्ध लोकगायिका श्रीमती कविता सिंह तथा उनके शिष्यों की सांस्कृतिक प्रस्तुति रही।
लोक कलाकारों ने पारंपरिक लोकसंगीत और गायन की विभिन्न प्रस्तुतियां देकर दर्शकों को भावविभोर कर दिया। उनकी प्रस्तुति में भारतीय लोकसंगीत की विविधता और परंपरागत शैली की सुंदर झलक देखने को मिली।
कार्यक्रम के दौरान राधा-कृष्ण के रूप में प्रस्तुत सांस्कृतिक झांकी ने भी दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया। इस प्रस्तुति ने कार्यक्रम की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक गरिमा को और बढ़ा दिया।
लोकवाद्य और संगीत की संगति बनी आकर्षण का केंद्र
कजरी उत्सव में गायन और नृत्य के साथ लोकवाद्य एवं संगीत की संगति भी विशेष आकर्षण का केंद्र रही। ढोलक पर हिमांशु निगम और की-बोर्ड पर अंश त्रिपाठी ने अपनी सुमधुर संगति से सांस्कृतिक प्रस्तुतियों को प्रभावशाली बनाया।
लोकगायन और वाद्य संगीत के बीच सुंदर तालमेल ने कार्यक्रम में जीवंतता बनाए रखी। पारंपरिक धुनों और आधुनिक मंचीय प्रस्तुति के बीच संतुलन ने दर्शकों को लोकसंस्कृति की जड़ों से जोड़ने का प्रयास किया।
विद्यार्थियों को सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने की पहल
विद्यालय द्वारा आयोजित कजरी उत्सव का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य विद्यार्थियों को भारतीय लोक परंपराओं, लोकगीतों और सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराना रहा। आधुनिक समय में जब नई पीढ़ी का जुड़ाव पारंपरिक लोककलाओं से धीरे-धीरे कम हो रहा है, ऐसे आयोजन विद्यार्थियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों को समझने का अवसर प्रदान करते हैं।
विद्यालय ने सावन की पारंपरिक स्मृतियों, झूला संस्कृति, लोकगीतों और लोकनृत्य के माध्यम से भारतीय ग्रामीण जीवन की सहजता और उल्लास को मंच पर प्रस्तुत किया।
इसके माध्यम से बच्चों को यह समझने का अवसर मिला कि लोकगीत और लोकनृत्य केवल मनोरंजन के साधन नहीं हैं, बल्कि वे समाज की परंपराओं, भावनाओं और जीवनशैली को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण माध्यम भी हैं।
अभिभाविकाओं ने की प्रस्तुतियों की सराहना
कजरी उत्सव में बड़ी संख्या में अभिभाविकाएं उपस्थित रहीं। उन्होंने छात्राओं, विद्यार्थियों और शिक्षिकाओं की प्रस्तुतियों की मुक्तकंठ से सराहना की।
अभिभाविकाओं ने विद्यालय की ओर से भारतीय लोकसंस्कृति और परंपराओं के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए किए जा रहे प्रयासों की प्रशंसा की। उनका मानना रहा कि इस तरह के आयोजन बच्चों को पढ़ाई के साथ अपनी संस्कृति और परंपराओं से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
उल्लासपूर्ण माहौल में हुआ समापन
कार्यक्रम का संचालन श्रीमती श्वेता द्विवेदी ने किया। उन्होंने कार्यक्रम की विभिन्न प्रस्तुतियों को क्रमबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया और कलाकारों तथा विद्यार्थियों का उत्साहवर्धन किया।
अंत में कजरी उत्सव का समापन उल्लासपूर्ण और सांस्कृतिक वातावरण में हुआ। पूरे आयोजन के दौरान सावन की लोकपरंपरा, संगीत, नृत्य और भारतीय सांस्कृतिक विरासत का सुंदर संगम देखने को मिला।
कुल मिलाकर, बी.एन.एस.डी. शिक्षा निकेतन, बेनाझावर में आयोजित कजरी उत्सव ने यह संदेश दिया कि विद्यालयी शिक्षा के साथ सांस्कृतिक शिक्षा भी विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे आयोजनों के माध्यम से बच्चों को अपनी लोकपरंपराओं को जानने, समझने और आगे बढ़ाने का अवसर मिलता है।

