बांदा में कथित अवैध क्लीनिकों पर सवाल, स्वास्थ्य विभाग से जांच और कार्रवाई की उठी मांग – जानिए कहां हैं यह

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रिपोर्ट – शैलेन्द्र शानू वर्मा 

बांदा: जनपद में बिना मान्य चिकित्सकीय योग्यता के इलाज किए जाने और क्लीनिकों के पंजीकरण को लेकर उठ रही शिकायतों ने स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं। बांदा मुख्यालय से लेकर अतर्रा कस्बे और ग्रामीण क्षेत्रों तक कुछ प्रतिष्ठानों के संचालन को लेकर सामने आए आरोपों के बीच निष्पक्ष जांच की मांग की जा रही है। इसी क्रम में अतर्रा थाना क्षेत्र के गर्गन पुरवा स्थित एक क्लीनिक की पड़ताल के दौरान संचालक की शैक्षिक योग्यता, पंजीकरण और इलाज से संबंधित दस्तावेजों को लेकर सवाल उठे हैं।

मामले में अभी तक संबंधित क्लीनिक के पंजीकरण, संचालक की चिकित्सकीय योग्यता और उपचार की प्रकृति की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए आरोपों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए स्वास्थ्य विभाग द्वारा दस्तावेजों का सत्यापन और नियमानुसार निरीक्षण आवश्यक है।

गर्गन पुरवा के क्लीनिक में योग्यता और पंजीकरण पर सवाल

मीडिया टीम गर्गन पुरवा स्थित राजकुमार कुशवाहा के क्लीनिक पहुंची। वहां संचालक से उनकी चिकित्सकीय योग्यता और क्लीनिक के वैध दस्तावेजों के बारे में जानकारी मांगी गई। उपलब्ध विवरण के अनुसार, उन्होंने अपनी शिक्षा इंटरमीडिएट तक बताई। इसके बाद उनसे चिकित्सकीय डिग्री तथा क्लीनिक और मेडिकल स्टोर के पंजीकरण से जुड़े दस्तावेज दिखाने का अनुरोध किया गया।

रिपोर्ट के मुताबिक, संचालक ने दस्तावेज प्रस्तुत करने के बजाय प्राइवेट प्राथमिक चिकित्सा मित्र मेडिकल सोसाइटी के अध्यक्ष बबलू गुप्ता से फोन पर बात करने को कहा। मीडिया टीम ने स्पष्ट किया कि मामले की पुष्टि के लिए संबंधित दस्तावेजों का सत्यापन जरूरी है।

इसी दौरान फोन पर हुई बातचीत में कथित तौर पर क्लीनिक के अंदर जाने पर सवाल उठाए गए और बाहर निकलने को कहा गया। हालांकि, इस घटनाक्रम से अपने आप यह साबित नहीं होता कि क्लीनिक अवैध रूप से संचालित हो रहा है। इसकी वास्तविक स्थिति पंजीकरण संबंधी रिकॉर्ड, संचालक की योग्यता और स्वास्थ्य विभाग की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

सीएमओ को दी गई मामले की जानकारी

मामले को लेकर मीडिया टीम ने मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. ब्रजेन्द्र सिंह से फोन पर संपर्क किया और उन्हें घटनाक्रम की जानकारी दी। उपलब्ध विवरण के अनुसार, सीएमओ ने कार्यालय आकर लिखित शिकायत देने को कहा। उन्होंने यह भी बताया कि वह सरकारी कार्य से लखनऊ जा रहे हैं।

मीडिया टीम ने उन्हें अन्य स्थानों पर भी ऐसी शिकायतों की पड़ताल किए जाने की जानकारी दी। इस पर सीएमओ ने संबंधित चिकित्सक के बारे में सूचना देने तथा फोटो और वीडियो उपलब्ध कराने पर कार्रवाई किए जाने की बात कही।

हालांकि, उपलब्ध जानकारी से यह स्पष्ट नहीं है कि इस मामले में अब तक कोई औपचारिक जांच पूरी हुई है या किसी प्रतिष्ठान के खिलाफ कार्रवाई की गई है। इसलिए विभाग की ओर से जांच की स्थिति और संबंधित दस्तावेजों की पुष्टि महत्वपूर्ण होगी।

क्लीनिक पर मिला संगठन का पंपलेट

पड़ताल के दौरान क्लीनिक के काउंटर की दीवार पर प्राइवेट प्राथमिक चिकित्सा मित्र मेडिकल सोसाइटी का एक पंपलेट चस्पा मिला। उस पर अध्यक्ष बबलू गुप्ता, कोषाध्यक्ष अखिलेश यादव, वरिष्ठ उपाध्यक्ष उमेश सर्राफ, संयोजक रामराज गुप्ता आनंद और प्रखंड संयोजक डीके गुप्ता के नाम व पद दर्ज थे।

पंपलेट पर 15 जुलाई 2025 को आयोजित एक कार्यक्रम का उल्लेख था। इसमें डिप्लोमा धारकों, फार्मासिस्टों और चिकित्सा मित्रों से कार्यक्रम में शामिल होकर एकजुटता प्रदर्शित करने का आह्वान किया गया था।

हालांकि, किसी संगठन का पंपलेट क्लीनिक पर लगा होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि संगठन अवैध चिकित्सा गतिविधियों को संरक्षण दे रहा है। इसके लिए संगठन की वास्तविक भूमिका, संबंधित व्यक्तियों की योग्यता और उनके दावों की स्वतंत्र जांच जरूरी है।

संगठन से जुड़े पदाधिकारी ने कही अपनी बात

इस संबंध में प्रांतीय संयोजक रामराज गुप्ता आनंद से बांदा के चमरौड़ी स्थित उनके मेडिकल स्टोर पर सवाल किए गए। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उन्होंने संगठन के बारे में जानकारी होने से इनकार किया और कहा कि वह अवैध गतिविधियों का समर्थन नहीं करते। उन्होंने ऐसे मामलों में प्रशासन द्वारा कार्रवाई किए जाने की बात भी कही।

दूसरी ओर, पड़ताल के दौरान डीके गुप्ता के पूर्व में एक चिकित्सक के यहां कंपाउंडर के रूप में काम करने की जानकारी सामने आई। आरोप लगाया गया कि वह डॉ. नरेश के नाम का सहारा लेकर इलाज कर रहे हैं। इसी तरह बबलू गुप्ता के मेडिकल स्टोर में फार्मासिस्ट की डिग्री के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठाए गए।

इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए संबंधित व्यक्तियों की योग्यता, मेडिकल स्टोर के लाइसेंस, फार्मासिस्ट की नियुक्ति और किसी अन्य चिकित्सक के नाम के कथित इस्तेमाल की जांच संबंधित विभाग द्वारा की जानी चाहिए। आरोपों पर संबंधित व्यक्तियों का पक्ष और आधिकारिक रिकॉर्ड सामने आने के बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी।

ग्रामीण क्षेत्रों के क्लीनिकों की जांच की जरूरत

मीडिया टीम ने ग्रामीण क्षेत्र के पथरा इलाके में भी कुछ क्लीनिक खुले देखे, लेकिन पड़ताल के समय संबंधित चिकित्सक वहां मौजूद नहीं थे। ऐसे में इन प्रतिष्ठानों के पंजीकरण, संचालकों की योग्यता और उपचार संबंधी गतिविधियों की जांच किए जाने की जरूरत सामने आई।

इसी बीच सीएमओ कार्यालय से डॉ. मदन सिंह का फोन आया। उपलब्ध विवरण के अनुसार, उन्होंने सरकारी कार्य से हाईकोर्ट जाने की बात कहते हुए सोमवार को अपना पक्ष रखने का अनुरोध किया। इन परिस्थितियों में मीडिया टीम अधिकारियों से मुलाकात कर फोटो और वीडियो उपलब्ध नहीं करा सकी।

कोडीनयुक्त कफ सिरप प्रकरण से अलग रखकर हो जांच

बांदा में कोडीनयुक्त कफ सिरप की कथित नशीली खेप बरामद होने का मामला भी चर्चा में रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, बिसंडा थाना पुलिस ने बड़ी खेप पकड़ी थी और इस मामले में गिरफ्तारियों की बात सामने आई थी।

हालांकि, फिलहाल ऐसा कोई प्रमाण सामने नहीं आया है जो इस प्रकरण को गर्गन पुरवा स्थित क्लीनिक या पंपलेट पर लिखे व्यक्तियों से जोड़ता हो। इसलिए दोनों मामलों को जोड़कर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। यदि जांच एजेंसियों को कोई संबंधित तथ्य मिलता है, तो उस पर नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है।

स्वास्थ्य विभाग से निष्पक्ष जांच की अपेक्षा

इस पूरे मामले में मुख्य सवाल यह है कि जिले में संचालित क्लीनिकों और मेडिकल स्टोरों की नियमित जांच किस प्रकार की जा रही है। स्वास्थ्य विभाग को शिकायतों के आधार पर संबंधित प्रतिष्ठानों के पंजीकरण, चिकित्सकीय योग्यता, दवा भंडारण और उपचार संबंधी रिकॉर्ड की जांच करनी चाहिए।

जहां नियमों का उल्लंघन प्रमाणित हो, वहां कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। साथ ही, जिन व्यक्तियों पर आरोप लगाए गए हैं, उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर देते हुए जांच निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए।

फिलहाल गर्गन पुरवा के क्लीनिक से जुड़े आरोपों की आधिकारिक पुष्टि और जांच के परिणाम सामने आना बाकी है। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग की ओर से स्थिति स्पष्ट करना और शिकायतों पर की गई कार्रवाई की जानकारी देना जरूरी है, ताकि मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित हो और लोगों का स्वास्थ्य व्यवस्था पर भरोसा बना रहे।

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