बच्चों को बचपन से दें धर्म और संस्कारों की शिक्षा, जीवनभर मिलता है मार्गदर्शन: देवव्रत जी महाराज
रिपोर्ट: अंजनी मिश्रा
अमेठी। उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले के संग्रामपुर क्षेत्र स्थित धौरहरा गांव में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन श्रद्धा और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला। इंद्रभान सिंह के निजी आवास पर चल रही श्रीमद्भागवत कथा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। कथा व्यास परम श्रद्धेय देवव्रत जी महाराज ने भक्त प्रह्लाद, ध्रुव चरित्र, समुद्र मंथन, अजामिल उपाख्यान और भगवान के विभिन्न अवतारों का विस्तार से वर्णन किया। इसके साथ ही उन्होंने धर्म, अध्यात्म, भक्ति और बच्चों में अच्छे संस्कार विकसित करने के महत्व पर प्रकाश डाला।
देवव्रत जी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि बच्चों को बचपन से ही धर्म, अध्यात्म और नैतिक मूल्यों की शिक्षा देनी चाहिए। बचपन में सीखे गए संस्कार व्यक्ति के जीवन की मजबूत नींव बनते हैं। यही संस्कार आगे चलकर उसे सही और गलत के बीच अंतर समझने, कठिन परिस्थितियों में उचित निर्णय लेने तथा समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने की प्रेरणा देते हैं।
उन्होंने कहा कि माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों की भूमिका बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में बेहद महत्वपूर्ण होती है। इसलिए बच्चों को केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि उन्हें प्रेम, करुणा, ईमानदारी, सेवा, विनम्रता और दूसरों के प्रति सम्मान जैसे गुण भी सिखाने चाहिए। धार्मिक कथाओं और महापुरुषों के जीवन प्रसंगों के माध्यम से बच्चों को जीवन के महत्वपूर्ण मूल्यों से परिचित कराया जा सकता है।
भक्त प्रह्लाद की कथा से मिली अटूट विश्वास की प्रेरणा
श्रीमद्भागवत कथा के दौरान देवव्रत जी महाराज ने भक्त प्रह्लाद के चरित्र का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने बताया कि प्रह्लाद बचपन से ही भगवान नारायण के परम भक्त थे। भागवत परंपरा के अनुसार, माता कयाधु के गर्भ में रहते हुए ही प्रह्लाद ने नारायण नाम और भक्ति का संदेश सुना था। यही कारण था कि उनके मन में भगवान के प्रति गहरी श्रद्धा और अटूट विश्वास विकसित हुआ।
महाराज ने कहा कि भक्त प्रह्लाद का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची श्रद्धा, विश्वास और सदाचार व्यक्ति को विपरीत परिस्थितियों में भी अपने मूल्यों पर दृढ़ रहने की शक्ति प्रदान करते हैं। उनका चरित्र बच्चों और युवाओं के लिए भी प्रेरणादायक है। इससे यह शिक्षा मिलती है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयां आएं, सत्य और अच्छे आचरण का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए।
उन्होंने श्रद्धालुओं को समझाया कि बच्चों के भीतर अच्छे संस्कार विकसित करने के लिए परिवार में सकारात्मक वातावरण बनाना आवश्यक है। यदि घर में बड़ों का सम्मान, धार्मिक विचारों, आपसी प्रेम और सेवा की भावना को महत्व दिया जाएगा, तो बच्चे भी इन गुणों को अपने जीवन में अपनाने के लिए प्रेरित होंगे।
ध्रुव चरित्र ने समझाया दृढ़ संकल्प और भक्ति का महत्व
कथा के अगले प्रसंग में देवव्रत जी महाराज ने भक्त ध्रुव की कथा सुनाई। उन्होंने बताया कि बालक ध्रुव ने मात्र पांच वर्ष की आयु में दृढ़ संकल्प और कठोर तपस्या के माध्यम से भगवान की कृपा प्राप्त की। उनकी कथा इस बात का संदेश देती है कि कम उम्र होने के बावजूद दृढ़ इच्छाशक्ति, एकाग्रता और निरंतर प्रयास से बड़े लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं।
महाराज ने कहा कि ध्रुव का चरित्र बच्चों को धैर्य, अनुशासन और अपने उद्देश्य के प्रति समर्पित रहने की प्रेरणा देता है। इसके साथ ही उन्होंने माता-पिता की सेवा, गुरुजनों के प्रति सम्मान और परिवार के प्रति कर्तव्य निभाने पर भी जोर दिया।
उन्होंने कहा कि धार्मिक संस्कारों का उद्देश्य केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। वास्तव में, इनका महत्व व्यक्ति के व्यवहार, विचारों और जीवनशैली में दिखाई देना चाहिए। जब बच्चे दूसरों की सहायता करना, बड़ों की बातों का सम्मान करना और जरूरतमंदों के प्रति संवेदनशील रहना सीखते हैं, तभी संस्कार उनके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा बनते हैं।
समुद्र मंथन और भगवान की लीलाओं का हुआ वर्णन
श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन समुद्र मंथन के प्रसंग का भी विस्तार से वर्णन किया गया। देवव्रत जी महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं और भगवान के विभिन्न अवतारों से जुड़े प्रसंग सुनाकर श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। इसके अलावा अजामिल उपाख्यान के माध्यम से भगवान के नाम-स्मरण, भक्ति और आध्यात्मिक चेतना के महत्व को समझाया।
कथा के दौरान महाराज ने धार्मिक प्रसंगों को जीवन से जोड़ते हुए श्रद्धालुओं को बताया कि धर्म मनुष्य को सदाचार, संयम और परोपकार की राह दिखाता है। वहीं, भक्ति व्यक्ति के मन में विश्वास और सकारात्मकता का संचार करती है। इसलिए धार्मिक आयोजनों में भाग लेने के साथ-साथ उनमें निहित शिक्षाओं को अपने दैनिक जीवन में अपनाना भी आवश्यक है।
प्रवचन के दौरान पंडाल में मौजूद श्रद्धालु भक्तिभाव से कथा का श्रवण करते रहे। भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं के वर्णन से वातावरण आध्यात्मिक और भक्तिमय बना रहा।
आसपास के गांवों से पहुंचे श्रद्धालु, आरती के बाद वितरित हुआ प्रसाद
धौरहरा गांव में आयोजित इस श्रीमद्भागवत कथा में स्थानीय ग्रामीणों के साथ आसपास के कई गांवों से भी श्रद्धालु पहुंचे। भावलपुर, बनवीरपुर, अंतू, गणेशपुर और अन्य क्षेत्रों से आए लोगों ने कथा का श्रवण किया। आयोजन में महिलाओं की विशेष भागीदारी देखने को मिली।
कथा के समापन पर भगवान की आरती उतारी गई। इसके बाद श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद वितरित किया गया। पूरे पंडाल में राधे-कृष्ण के जयकारे गूंजते रहे और भक्तिमय वातावरण बना रहा।

