मथुरा में विजयदशमी पर रावण दहन का विरोध, सारस्वत समाज ने लंकेश मंदिर में की पूजा-अर्चना
रिपोर्ट – योगेश भारद्वाज
मथुरा में विजयदशमी के अवसर पर रावण दहन को लेकर अलग विचार सामने आए। यमुना किनारे स्थित जयश्री लंकेश मंदिर में सारस्वत समाज के लोगों ने रावण की पूजा-अर्चना कर पुतला दहन का विरोध जताया। समाज के लोगों का कहना है कि रावण एक प्रकांड विद्वान थे और भगवान श्रीराम के आचार्य के रूप में भी उनका उल्लेख किया जाता है। ऐसे में उनका मानना है कि रावण के पुतले का दहन करने के बजाय लोगों को अपने भीतर मौजूद बुराइयों को समाप्त करने पर ध्यान देना चाहिए।
मथुरा में रावण दहन को लेकर सारस्वत समाज ने जताया विरोध
मथुरा। विजयदशमी का पर्व देशभर में बुराई पर अच्छाई और अधर्म पर धर्म की विजय के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर जगह-जगह रावण के पुतले का दहन किया जाता है। वहीं, उत्तर प्रदेश के मथुरा में इस परंपरा को लेकर एक अलग दृष्टिकोण सामने आया। शहर में एक ओर जहां रावण दहन की तैयारियां चल रही थीं, वहीं दूसरी ओर यमुना किनारे स्थित जयश्री लंकेश मंदिर में सारस्वत समाज के लोगों ने विशेष पूजा-अर्चना की।
इस दौरान समाज के श्रद्धालुओं ने रावण को लंकेश के रूप में स्मरण करते हुए उनकी पूजा की। साथ ही, उन्होंने विजयदशमी पर रावण का पुतला जलाने की परंपरा पर अपनी आपत्ति जताई। उनका कहना है कि किसी व्यक्ति के जीवन से जुड़ी घटनाओं और उसके विद्वतापूर्ण पक्ष को भी समझना आवश्यक है। इसलिए विजयदशमी के अवसर पर केवल पुतला दहन करने के बजाय इस पर्व के मूल संदेश पर विचार किया जाना चाहिए।
रावण को प्रकांड विद्वान मानता है सारस्वत समाज
जयश्री लंकेश मंदिर में पूजा-अर्चना करने वाले सारस्वत समाज के लोगों के अनुसार, रावण केवल रामायण के एक प्रमुख पात्र ही नहीं, बल्कि प्रकांड विद्वान भी थे। उनका कहना है कि रावण को उनके ज्ञान, विद्वता और धार्मिक परंपराओं से जुड़े विभिन्न संदर्भों के आधार पर भी देखा जाना चाहिए।
श्रद्धालुओं का तर्क है कि भगवान श्रीराम के आदर्शों को समझने के लिए उनके जीवन से जुड़ी परंपराओं और मान्यताओं पर भी विचार करना जरूरी है। इसी दृष्टिकोण के आधार पर वे रावण के पुतले के सार्वजनिक दहन का विरोध करते हैं।
हालांकि, भारतीय धार्मिक परंपराओं में विजयदशमी को भगवान श्रीराम की रावण पर विजय के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। दूसरी ओर, कुछ समुदाय रावण के विद्वतापूर्ण पक्ष को विशेष महत्व देते हैं। इस प्रकार, विजयदशमी के अवसर पर रावण को लेकर अलग-अलग धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण देखने को मिलते हैं।
लंकेश भक्त मंडल ने उठाई पुतला दहन पर रोक लगाने की मांग
लंकेश भक्त मंडल के संरक्षक ओमवीर सारस्वत ने रावण दहन की परंपरा पर सवाल उठाते हुए कहा कि हर साल रावण के पुतले जलाए जाते हैं, लेकिन इसके बावजूद समाज में बुराइयां समाप्त नहीं हो रही हैं। उनके अनुसार, यदि विजयदशमी को बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व माना जाता है, तो लोगों को सबसे पहले अपने भीतर मौजूद बुराइयों को पहचानकर उन्हें दूर करने का प्रयास करना चाहिए।
ओमवीर सारस्वत का मानना है कि रावण दहन केवल एक प्रतीकात्मक आयोजन बनकर नहीं रह जाना चाहिए। इसके बजाय लोगों को अपने व्यवहार, विचारों और आचरण में सकारात्मक बदलाव लाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि समाज में व्याप्त अहंकार, गलत आचरण और अन्य नकारात्मक प्रवृत्तियों को दूर करना ही इस पर्व के संदेश को सार्थक बनाने का बेहतर तरीका हो सकता है।
उन्होंने यह भी मांग की कि रावण वध को रामलीला के मंचन तक सीमित रखा जाए और विभिन्न स्थानों पर होने वाले पुतला दहन पर रोक लगाने पर विचार किया जाए। उनके अनुसार, धार्मिक आयोजनों का उद्देश्य समाज को सकारात्मक संदेश देना होना चाहिए।
विजयदशमी के संदेश पर नए सिरे से विचार करने की अपील
सारस्वत समाज के लोगों का कहना है कि विजयदशमी केवल रावण दहन तक सीमित नहीं होनी चाहिए। इस पर्व के माध्यम से लोगों को सत्य, सदाचार, संयम और अच्छे आचरण का संदेश ग्रहण करना चाहिए। उनका मानना है कि यदि व्यक्ति अपने जीवन में गलत आदतों और नकारात्मक विचारों को दूर करने का संकल्प ले, तो त्योहार का सामाजिक महत्व और अधिक बढ़ सकता है।
वहीं, परंपरागत रूप से विजयदशमी पर रावण दहन को भगवान श्रीराम की विजय और बुराई के अंत के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। रामलीला के आयोजनों में रावण वध का मंचन इसी धार्मिक मान्यता के अनुरूप किया जाता है। ऐसे में सारस्वत समाज की ओर से उठाई गई मांग ने इस परंपरा को लेकर एक अलग विचारधारा को सामने रखा है।
इस पूरे मामले में महत्वपूर्ण बात यह है कि विजयदशमी का मूल संदेश समाज में अच्छे आचरण, नैतिकता और सकारात्मक मूल्यों को बढ़ावा देना है। अलग-अलग समुदाय इस संदेश को अपनी धार्मिक मान्यताओं और सांस्कृतिक परंपराओं के अनुसार समझते हैं।
समाज में चर्चा का विषय बनी रावण दहन पर आपत्ति
मथुरा में जयश्री लंकेश मंदिर में हुई पूजा-अर्चना और रावण दहन का विरोध विजयदशमी के अवसर पर चर्चा का विषय बना। एक ओर जहां लोग परंपरागत रूप से रावण दहन के माध्यम से भगवान श्रीराम की विजय का उत्सव मनाते हैं, वहीं सारस्वत समाज के लोगों ने रावण के विद्वतापूर्ण पक्ष को महत्व देते हुए पुतला दहन की परंपरा पर पुनर्विचार करने की मांग की।
लंकेश भक्त मंडल के संरक्षक ओमवीर सारस्वत ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि उनके अनुसार, वास्तविक बदलाव व्यक्ति के भीतर होना चाहिए। केवल पुतला जलाने से समाज की बुराइयां समाप्त नहीं होंगी। इसके लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने आचरण में सुधार करना होगा।
कुल मिलाकर, मथुरा में विजयदशमी के अवसर पर सामने आया यह विरोध धार्मिक मान्यताओं, सांस्कृतिक परंपराओं और त्योहारों के सामाजिक संदेश को लेकर विभिन्न दृष्टिकोणों को दर्शाता है। सारस्वत समाज ने रावण की पूजा-अर्चना के माध्यम से अपनी मान्यता व्यक्त की और पुतला दहन के स्थान पर आत्ममंथन तथा बुराइयों के त्याग पर जोर दिया।

