कानपुर का अनोखा रावण मंदिर: दशहरे पर खुलते हैं कपाट, दूध से होता है लंकापति का अभिषेक

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रिपोर्ट-  हनुमंत सिंह पिंटू
कानपुर नगर।
देशभर में विजयादशमी का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर भगवान श्रीराम की विजय की स्मृति में रावण के पुतलों का दहन किया जाता है। हालांकि, उत्तर प्रदेश के कानपुर नगर में एक ऐसा अनोखा मंदिर भी है, जहां दशहरे के दिन लंकापति रावण की पूजा-अर्चना की जाती है। यहां साल में केवल एक बार, विजयादशमी के अवसर पर मंदिर के कपाट खोले जाते हैं और रावण की प्रतिमा का दूध से अभिषेक कर विधि-विधान से पूजन किया जाता है।

कानपुर के बड़ा चौराहा के पास शिवाला बाजार स्थित कैलाश नारायण मंदिर परिसर में बना यह रावण मंदिर अपनी अनूठी परंपरा और ऐतिहासिक महत्त्व के कारण विशेष पहचान रखता है। दशहरे के अवसर पर इस मंदिर में दर्शन और पूजन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है। वहीं, मंदिर की परंपरा स्थानीय लोगों और दूर-दराज से आने वाले भक्तों के बीच आकर्षण का केंद्र बनी रहती है।

वर्ष 1868 में हुई थी रावण मंदिर की स्थापना

कानपुर के शिवाला स्थित रावण मंदिर का इतिहास काफी पुराना बताया जाता है। मंदिर की स्थापना वर्ष 1868 में हुई थी। मंदिर के पुजारी विनोद कुमार शुक्ल के अनुसार, स्थापना के समय से ही विजयादशमी पर मंदिर के कपाट खोलने और रावण की पूजा करने की परंपरा निभाई जा रही है। समय के साथ शहर में अनेक बदलाव हुए, लेकिन इस मंदिर की विशिष्ट धार्मिक परंपरा आज भी जारी है।

आमतौर पर दशहरे के दिन देश के विभिन्न हिस्सों में रावण दहन के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इसके विपरीत, कानपुर के इस मंदिर में रावण के विद्वान स्वरूप को ध्यान में रखते हुए उनकी पूजा की जाती है। यही विशेषता इस मंदिर को अन्य धार्मिक स्थलों से अलग पहचान दिलाती है।

साल में एक दिन खुलते हैं मंदिर के कपाट

इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि इसके कपाट साल में केवल विजयादशमी के दिन ही खोले जाते हैं। श्रद्धालु पूरे वर्ष इस विशेष अवसर की प्रतीक्षा करते हैं। दशहरे के दिन कपाट खुलने के बाद सबसे पहले मंदिर परिसर की साफ-सफाई की जाती है। इसके बाद पूजा-अर्चना की तैयारियां पूरी की जाती हैं।

मंदिर में दर्शन करने पहुंचने वाले भक्तों के लिए यह दिन विशेष महत्त्व रखता है। परंपरा के अनुसार, रावण की प्रतिमा को दूध से स्नान कराया जाता है। इस धार्मिक प्रक्रिया को दुग्ध अभिषेक कहा जाता है। इसके बाद प्रतिमा का श्रृंगार किया जाता है और मंत्रोच्चार के साथ स्तुति तथा आरती संपन्न होती है।

इस दौरान श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार पूजा-अर्चना करते हैं। मंदिर के कपाट सीमित समय के लिए खुलने के कारण दशहरे के दिन यहां का वातावरण विशेष धार्मिक उत्साह से भर जाता है।

रावण के विद्वान स्वरूप की होती है पूजा

रामायण की कथा में रावण को लंका का शक्तिशाली राजा और भगवान शिव का उपासक बताया गया है। इसके साथ ही उसे वेदों का ज्ञाता, विद्वान और नीतिशास्त्र का जानकार भी माना जाता है। हालांकि, उसके अहंकार और अधर्म के कारण भगवान श्रीराम के हाथों उसका अंत हुआ। इसी वजह से विजयादशमी को असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक माना जाता है।

वहीं, कानपुर के इस मंदिर में रावण के विद्वान और ज्ञानवान स्वरूप को महत्त्व दिया जाता है। मंदिर से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रावण के ज्ञान और उसकी विद्वत्ता का स्मरण करते हुए दशहरे पर विशेष पूजन किया जाता है। इस प्रकार यहां की परंपरा रावण के चरित्र के उस पक्ष को सामने लाती है, जिसमें उसके ज्ञान और शास्त्रों के अध्ययन का उल्लेख मिलता है।

भगवान श्रीराम ने भी रावण के ज्ञान का किया सम्मान

रामायण की प्रचलित कथा के अनुसार, युद्ध में रावण के अंतिम समय में भगवान श्रीराम ने लक्ष्मण को उससे ज्ञान और नीति की शिक्षा लेने की सलाह दी थी। इस प्रसंग को रावण की विद्वत्ता के सम्मान के रूप में देखा जाता है। धार्मिक कथाओं में यह संदेश भी मिलता है कि किसी व्यक्ति के ज्ञान से सीख ली जा सकती है, भले ही उसके आचरण से असहमति हो।

हालांकि, रावण की पूजा से जुड़ी अलग-अलग परंपराएं स्थानीय मान्यताओं और धार्मिक दृष्टिकोणों पर आधारित हैं। कानपुर के इस मंदिर में विजयादशमी पर होने वाला पूजन भी इसी विशिष्ट परंपरा का हिस्सा है। यहां रावण के जीवन से जुड़े ज्ञान और विद्वत्ता के पहलुओं को स्मरण किया जाता है।

मन्नत मांगने के लिए भी पहुंचते हैं श्रद्धालु

स्थानीय लोगों और मंदिर में आने वाले भक्तों के बीच यह मान्यता प्रचलित है कि यहां सच्चे मन से प्रार्थना करने पर मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इसी विश्वास के साथ श्रद्धालु विजयादशमी के दिन मंदिर पहुंचते हैं और पूजा-अर्चना करते हैं। हालांकि, मनोकामनाएं पूरी होने से जुड़ी बातें धार्मिक आस्था का विषय हैं।

मंदिर के पुजारी विनोद कुमार शुक्ल के अनुसार, दशहरे पर कपाट खुलने और विशेष पूजा की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। मंदिर से जुड़ी इस अनूठी परंपरा के कारण कानपुर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान में भी इसका विशेष स्थान है।

आस्था और परंपरा का अनूठा संगम है कानपुर का रावण मंदिर

कानपुर का शिवाला स्थित रावण मंदिर भारतीय धार्मिक परंपराओं की विविधता का एक अनूठा उदाहरण है। एक ओर विजयादशमी पर रावण दहन के माध्यम से बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है, वहीं दूसरी ओर इस मंदिर में रावण के विद्वान स्वरूप का स्मरण करते हुए पूजा की जाती है।

इस प्रकार, वर्ष में एक बार खुलने वाले मंदिर के कपाट, दूध से होने वाला अभिषेक और विशेष आरती इसे विशिष्ट बनाते हैं। दशहरे के अवसर पर यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह केवल पूजा का अवसर नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही परंपरा से जुड़ने का भी माध्यम है।

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