औरैया में हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल: मुस्लिम कारीगर बना रहे 50 फीट ऊंचा रावण का पुतला
रिपोर्टर- अंजुमं तिवारी
औरैया: दशहरा पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इस त्योहार के दौरान देशभर में रावण दहन के आयोजन होते हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश के औरैया जिले में दशहरे की तैयारियों के बीच हिंदू-मुस्लिम एकता और गंगा-जमुनी तहजीब की एक अनूठी तस्वीर सामने आई है। यहां पुरानी नुमाइश मैदान में आयोजित होने वाली ऐतिहासिक रामलीला के लिए मुस्लिम कारीगर कई पीढ़ियों से रावण के पुतले का निर्माण करते आ रहे हैं। इस बार भी जालौन जिले से आए कारीगर करीब 50 फीट ऊंचा रावण का पुतला तैयार करने में जुटे हैं।
यह परंपरा केवल पुतला बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि आपसी प्रेम, भाईचारे और साझा सांस्कृतिक विरासत का संदेश भी देती है। जहां एक ओर रामलीला कमेटी दशहरा आयोजन की तैयारियों को अंतिम रूप दे रही है, वहीं दूसरी ओर कारीगर दिन-रात मेहनत करके रावण के पुतले को आकर्षक स्वरूप देने में लगे हुए हैं।
पुरानी नुमाइश मैदान में तैयार हो रहा 50 फीट ऊंचा रावण
औरैया सदर कोतवाली क्षेत्र के पुरानी नुमाइश मैदान में हर वर्ष दशहरा पर्व के अवसर पर रावण दहन का आयोजन किया जाता है। इस बार भी आयोजन को लेकर लोगों में उत्साह है। कार्यक्रम के मुख्य आकर्षण के रूप में करीब 50 फीट ऊंचा रावण का पुतला तैयार किया जा रहा है।
पुतले के निर्माण में बांस, कागज और बोरियों जैसी सामग्रियों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसकी ऊंचाई और बनावट को ध्यान में रखते हुए कारीगर सावधानीपूर्वक अलग-अलग हिस्सों को जोड़ रहे हैं। इसके अलावा, पुतले को अंतिम रूप देने के लिए उसकी संरचना को मजबूत बनाने और बाहरी सजावट पर भी ध्यान दिया जा रहा है।
निर्माण कार्य में तीन से चार कारीगर लगे हुए हैं। अनुमान के मुताबिक, पुतला तैयार करने में करीब 80 हजार रुपये से लेकर एक लाख रुपये तक खर्च आएगा। कारीगरों को उम्मीद है कि दशहरे के दिन दोपहर 12 बजे तक पुतला पूरी तरह तैयार हो जाएगा। इसके बाद इसे रावण दहन कार्यक्रम के लिए मैदान में व्यवस्थित किया जाएगा।
चौथी पीढ़ी तक जारी है पुतले बनाने की परंपरा
जालौन जिले से आए कारीगर अफसर ने बताया कि उनके परिवार में रावण के पुतले बनाने की परंपरा कई पीढ़ियों से चली आ रही है। उनके मुताबिक, परिवार की चौथी पीढ़ी भी इसी काम को आगे बढ़ा रही है। इस तरह यह हुनर उनके परिवार की पहचान बन चुका है।
अफसर ने बताया कि दशहरे के मौसम में वे रावण के पुतले बनाते हैं, जबकि मोहर्रम के दौरान ताजिए तैयार करने का काम भी करते हैं। इसके अलावा, आसपास के अन्य स्थानों पर होने वाले आयोजनों के लिए भी कारीगर पुतले बनाते हैं।
उन्होंने कहा कि औरैया में उन्हें हमेशा प्यार और सम्मान मिला है। यहां काम करने के दौरान कभी किसी तरह के भेदभाव का अनुभव नहीं हुआ। रामलीला कमेटी के सदस्यों और स्थानीय लोगों का व्यवहार सहयोगपूर्ण रहा है। यही वजह है कि परिवार की पुरानी परंपरा आज भी पूरी मेहनत और लगन के साथ जारी है।
रामलीला कमेटी ने की कारीगरों की सराहना
रामलीला कमेटी के अध्यक्ष छुन्ना मिश्रा ने बताया कि वह कई वर्षों से पुरानी नुमाइश मैदान में आयोजित होने वाले रावण दहन कार्यक्रम को देखते आ रहे हैं। उनके अनुसार, जालौन और उरई से आने वाले मुस्लिम कारीगर लंबे समय से यहां रावण के पुतले बनाने का काम करते रहे हैं।
उन्होंने कहा कि इन कारीगरों की कला और मेहनत औरैया के दशहरा आयोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उनके परिवारों में पिता और दादा के समय से यह काम होता आया है। इसलिए यह परंपरा केवल रोजगार का माध्यम नहीं, बल्कि पीढ़ियों से संजोकर रखे गए हुनर का भी उदाहरण है।
छुन्ना मिश्रा के मुताबिक, इन कारीगरों द्वारा तैयार किया गया रावण का पुतला हर वर्ष आयोजन की तैयारियों में विशेष स्थान रखता है। कमेटी और स्थानीय लोग उनके काम को सम्मान देते हैं और पुतला तैयार करने में आवश्यक सहयोग भी करते हैं।
गंगा-जमुनी तहजीब का संदेश दे रहा औरैया
भारत की सांस्कृतिक विविधता की खूबसूरती इस बात में है कि अलग-अलग धर्मों और समुदायों के लोग एक-दूसरे के त्योहारों तथा परंपराओं में सहयोग करते हैं। औरैया में रावण का पुतला बनाने वाले मुस्लिम कारीगर इसी साझा संस्कृति की मिसाल पेश कर रहे हैं।
एक ओर दशहरे के दौरान रावण दहन बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देता है, वहीं दूसरी ओर इस पुतले को तैयार करने में जुटे कारीगर सामाजिक सद्भाव और आपसी विश्वास की तस्वीर सामने लाते हैं। इसके साथ ही, मोहर्रम के अवसर पर ताजिए बनाने का उनका काम भारतीय समाज की सांस्कृतिक साझेदारी को भी दर्शाता है।
हालांकि, अलग-अलग धार्मिक परंपराओं के अपने विशिष्ट अर्थ और महत्व हैं, लेकिन इन आयोजनों से जुड़े कारीगरों और स्थानीय लोगों के बीच सहयोग की भावना सामाजिक एकता को मजबूत करती है। औरैया में वर्षों से जारी यह परंपरा बताती है कि कला और मेहनत लोगों को जोड़ने का प्रभावी माध्यम बन सकती है।
दशहरे के दिन होगा रावण दहन
फिलहाल पुरानी नुमाइश मैदान में पुतले को अंतिम रूप देने का काम जारी है। कारीगर निर्धारित समय तक निर्माण पूरा करने के लिए जुटे हुए हैं। दशहरे के अवसर पर करीब 50 फीट ऊंचे रावण के पुतले का दहन किया जाएगा। इस आयोजन को देखने के लिए स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं में उत्साह बना हुआ है।
कुल मिलाकर, औरैया का यह आयोजन केवल धार्मिक उत्सव तक सीमित नहीं है। यहां कई पीढ़ियों से मुस्लिम कारीगरों द्वारा रावण का पुतला तैयार किया जाना आपसी सम्मान, परंपरा और सामाजिक सौहार्द की एक महत्वपूर्ण मिसाल है। पुरानी नुमाइश मैदान में खड़ा होने वाला 50 फीट ऊंचा रावण इस बार भी दशहरा उत्सव का आकर्षण बनेगा और साथ ही गंगा-जमुनी तहजीब तथा हिंदू-मुस्लिम एकता का संदेश भी देगा।

