कानपुर: डेल्टा अस्पताल के डॉ. शैलेश कुमार सिंह ने पेश की मानवता की मिसाल, जरूरतमंद परिवार को राशन और रक्तदान में मदद
रिपोर्ट – डिजिटल उप्रन्यूज़
कानपुर। आधुनिकता और दिखावे के इस दौर में जब लोग बड़े-बड़े आयोजनों पर हजारों रुपये खर्च करते हैं, वहीं किसी जरूरतमंद परिवार की मदद के लिए आगे आना सच्ची इंसानियत का परिचय देता है। कानपुर के साकेत नगर स्थित डेल्टा अस्पताल के न्यूरो एवं स्पाइन विशेषज्ञ सर्जन डॉ. शैलेश कुमार सिंह ने मानवीय संवेदना की ऐसी ही मिसाल पेश की है। उन्होंने एक जरूरतमंद परिवार को राशन उपलब्ध कराने के साथ ही गंभीर रूप से बीमार एक बुजुर्ग मरीज के लिए रक्त की व्यवस्था में भी महत्वपूर्ण सहयोग किया। उनके इस प्रयास ने समाज में सहयोग, करुणा और मानवता के महत्व को एक बार फिर उजागर किया है।
बीमारी से जूझता परिवार, आर्थिक संकट ने बढ़ाई परेशानी
एक परिवार की वास्तविक परिस्थितियों को समझने के लिए उसके सदस्यों के दर्द और संघर्ष को महसूस करना जरूरी है। कानपुर में रहने वाले एक पंडित जी का परिवार पिछले कई महीनों से मुश्किल हालात का सामना कर रहा है। जानकारी के अनुसार, पंडित जी करीब एक साल पहले छत से गिरने के बाद से बिस्तर पर हैं। वहीं, उनकी पत्नी पैरालिसिस अटैक से पीड़ित होने के कारण बिस्तर पर ही रहने को मजबूर हैं।
परिवार की जिम्मेदारियां अब उनके दोनों बेटों के कंधों पर आ गई हैं। उनकी शादीशुदा बेटी अपने ससुराल में रहती है। लगभग 9 से 10 साल का छोटा बेटा पढ़ाई-लिखाई छोड़कर माता-पिता की देखभाल में लगा हुआ है। दूसरी ओर, 17 से 18 साल का बड़ा बेटा भी पढ़ाई अधूरी छोड़कर नौकरी करने को मजबूर है।
बताया गया कि बड़ा बेटा पनकी-दादानगर क्षेत्र की एक दालमोठ फर्म में काम करता है, जहां उसे करीब 8 से 9 हजार रुपये प्रतिमाह मिलते हैं। इतनी कम आय में घर का खर्च चलाना, माता-पिता की देखभाल करना और लगातार दवाइयों का खर्च उठाना उसके लिए बेहद कठिन हो गया है। इसके बावजूद वह अपनी जिम्मेदारियों को निभाने का प्रयास कर रहा है।
आधार और राशन कार्ड नहीं होने से सरकारी योजनाओं का लाभ मुश्किल
परिवार की परेशानी केवल बीमारी और आर्थिक तंगी तक सीमित नहीं है। जानकारी के मुताबिक, पंडित जी के पास आधार कार्ड और राशन कार्ड जैसे जरूरी दस्तावेज भी उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में आयुष्मान भारत जैसी स्वास्थ्य योजनाओं का लाभ लेने की प्रक्रिया भी उनके लिए मुश्किल हो सकती है।
दूसरी ओर, बड़े बेटे को प्रतिदिन 10 से 12 घंटे तक नौकरी करनी पड़ती है। ऐसे में परिवार के दस्तावेज तैयार कराने और सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने के लिए समय निकालना उसके लिए आसान नहीं है। परिवार को अब इस बात का भी एहसास हो रहा है कि अच्छे समय में जरूरी दस्तावेजों पर ध्यान देना कितना महत्वपूर्ण होता है।
हालांकि, ऐसे हालात में किसी जरूरतमंद को केवल उसकी परेशानियों के लिए जिम्मेदार ठहराने के बजाय उसकी सहायता के रास्ते तलाशना अधिक जरूरी है।
डॉ. शैलेश कुमार सिंह ने पहुंचाया राशन
इसी कठिन परिस्थिति में डेल्टा अस्पताल, साकेत नगर के न्यूरो एवं स्पाइन विशेषज्ञ सर्जन डॉ. शैलेश कुमार सिंह ने संवेदनशीलता का परिचय दिया। उन्होंने परिवार की जरूरतों को समझते हुए राशन की व्यवस्था कराई और उसे पंडित जी के बेटे को सौंप दिया।
इस सहायता से परिवार को कुछ राहत मिली। खास बात यह रही कि मदद को केवल औपचारिकता तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि जरूरतमंद परिवार की तत्काल आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए कदम उठाया गया।
परिवार के सदस्य हिमांशु ने भी अपनी परेशानी सार्वजनिक करने पर सहमति जताई। उन्होंने कहा कि उन्हें अपनी तस्वीर सोशल मीडिया पर साझा किए जाने से कोई शिकायत नहीं है। उनका मानना है कि मजबूरी को छिपाकर अकेले संघर्ष करते रहने के बजाय अपनी परिस्थितियों को समाज के सामने रखना चाहिए, ताकि कोई मदद के लिए आगे आ सके।
उनकी यह सोच उन लोगों के लिए प्रेरणा है, जो आर्थिक या पारिवारिक परेशानियों के कारण सहायता मांगने में संकोच करते हैं।
बुजुर्ग मरीज के लिए तीन यूनिट बी पॉजिटिव रक्त की जरूरत
मानवता और सहयोग का एक अन्य उदाहरण डेल्टा अस्पताल में उस समय सामने आया, जब एक बुजुर्ग मरीज के उपचार के दौरान रक्त की कमी के कारण तीन यूनिट बी पॉजिटिव रक्त की आवश्यकता पड़ी।
मरीज की देखभाल में लगे परिजनों के सामने रक्त की व्यवस्था करना चुनौती बन गया था। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पहली यूनिट रक्त मरीज के बेटे ने दान की। इसके बाद दूसरी यूनिट की व्यवस्था सामाजिक संस्था संकल्प सेवा संस्था के संतोष सिंह चौहान के सहयोग से हुई।
हालांकि, तीसरी यूनिट की जरूरत पड़ने पर परिवार के सामने फिर संकट खड़ा हो गया। मरीज के बेटे ने असमर्थता जताते हुए कहा कि मदद के लिए उसके पास कोई अपना नहीं है। ऐसी स्थिति में परिवार के लोगों की उम्मीद कमजोर पड़ने लगी थी।
डॉ. शैलेश कुमार सिंह ने रक्त की व्यवस्था में किया सहयोग
इसी दौरान डॉ. शैलेश कुमार सिंह ने आगे आकर मदद का हाथ बढ़ाया। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, उन्होंने अपना व्यक्तिगत डोनर कार्ड उपलब्ध कराया और रक्त की व्यवस्था से जुड़ी प्रक्रिया में सहयोग का भरोसा दिया। साथ ही, उन्होंने प्रोसेसिंग फीस की जरूरत पड़ने पर सूचित करने को कहा।
इसके अतिरिक्त, मरीज की आर्थिक स्थिति को देखते हुए सीता रसोई के माध्यम से राशन की व्यवस्था भी कराई गई। इस तरह चिकित्सा संबंधी जरूरत के साथ-साथ परिवार की भोजन संबंधी परेशानी को भी ध्यान में रखा गया।
हालांकि, रक्त की व्यवस्था में सहयोग और मरीज को वास्तव में रक्त चढ़ाए जाने की स्थिति की अलग-अलग पुष्टि आवश्यक है। फिर भी, संकट की घड़ी में सहायता के लिए आगे आने का यह प्रयास सामाजिक संवेदनशीलता का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
दिखावे से आगे बढ़कर इंसानियत को प्राथमिकता देने की जरूरत
आज शादी-विवाह और दूसरे आयोजनों में सैकड़ों निमंत्रण पत्र बांटना आम बात है। लेकिन जब किसी मरीज को रक्त की जरूरत होती है, तब कई परिवारों को मदद जुटाने के लिए सामाजिक संस्थाओं और परिचितों का सहारा लेना पड़ता है। यह स्थिति समाज को आत्ममंथन करने का अवसर देती है।
इसलिए जरूरी है कि हम केवल समारोहों और सामाजिक प्रतिष्ठा तक अपनी जिम्मेदारियों को सीमित न रखें। रक्तदान, जरूरतमंदों को भोजन उपलब्ध कराना, बीमार परिवारों की सहायता करना और जरूरी दस्तावेज बनवाने में सहयोग देना भी सामाजिक जिम्मेदारी का हिस्सा है।
डॉ. शैलेश कुमार सिंह, संतोष सिंह चौहान और संकल्प सेवा संस्था जैसे सहयोगी प्रयास यह संदेश देते हैं कि समय पर की गई छोटी-सी मदद भी किसी परिवार के लिए बड़ी राहत बन सकती है।
अंततः, समाज में बदलाव केवल सरकारी योजनाओं से नहीं, बल्कि लोगों की संवेदनशीलता और सक्रिय भागीदारी से भी आता है। यदि हम अपने आसपास जरूरतमंद लोगों की परेशानियों को समझें और अपनी क्षमता के अनुसार सहायता करें, तो इंसानियत की यह लौ और मजबूत हो सकती है। सच यही है कि दिखावे से अधिक महत्वपूर्ण संवेदना है, और समाज तभी बदलेगा जब हम दूसरों के दर्द को अपना समझना शुरू करेंगे।

