बांदा प्रेस ट्रस्ट ने खोला मोर्चा: पत्रकार रामकिशोर उपाध्याय के मामले में निष्पक्ष जांच की मांग
रिपोर्ट – शैलेन्द्र शानू वर्मा
बांदा। उत्तर प्रदेश के बांदा में किसान की जमीन से जुड़े कथित विवाद ने अब पुलिस विवेचना की निष्पक्षता और पत्रकारिता की स्वतंत्रता को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। गुलमोहर इको विलेज रिजॉर्ट से संबंधित मुकदमा संख्या 187/2026, थाना नरैनी के मामले में बांदा प्रेस ट्रस्ट ने मोर्चा खोलते हुए उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। वरिष्ठ पत्रकार अनिल तिवारी के नेतृत्व में दर्जनों पत्रकारों ने ज्ञापन सौंपकर मामले की विवेचना दूसरे जनपद के किसी सक्षम अधिकारी से कराने और पत्रकार रामकिशोर उपाध्याय के विरुद्ध कार्रवाई की परिस्थितियों की निष्पक्ष जांच कराने की मांग उठाई।
पत्रकारों का आरोप है कि इस प्रकरण में कई ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब जांच के माध्यम से सामने आना चाहिए। उनका कहना है कि किसान की जमीन से जुड़े विवाद की वास्तविक स्थिति स्पष्ट होने के साथ ही मुकदमे में धाराओं के परिवर्तन, एससी/एसटी एक्ट की धाराओं में वृद्धि और खबरें प्रकाशित करने वाले पत्रकार को नोटिस जारी किए जाने के आधार की भी पड़ताल होनी चाहिए।
पत्रकार रामकिशोर उपाध्याय को नोटिस जारी करने पर उठे सवाल
इस पूरे मामले में पत्रकार रामकिशोर उपाध्याय को जारी किए गए नोटिस का मुद्दा प्रमुखता से सामने आया है। ज्ञापन में दी गई जानकारी के अनुसार, रामकिशोर उपाध्याय ने पुलिस अधीक्षक, बांदा के कार्यालय पहुंचकर संबंधित व्यक्तियों के बयान लिए थे। इसके बाद उन्होंने मामले से जुड़ी खबरें प्रकाशित की थीं। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि इसके बाद उनके विरुद्ध नोटिस जारी किए जाने की कार्रवाई सामने आई, जिससे पत्रकारों के बीच असंतोष बढ़ा।
हालांकि, नोटिस जारी करने के पीछे पुलिस का आधिकारिक पक्ष और उसका विधिक आधार सामने आना भी जरूरी है। इसलिए पत्रकारों ने मांग की है कि इस कार्रवाई की परिस्थितियों की निष्पक्ष जांच कराई जाए। यदि नोटिस जारी करने के पीछे पर्याप्त साक्ष्य और कानूनी आधार हैं, तो उन्हें स्पष्ट किया जाए। वहीं, यदि जांच में पत्रकारिता के कार्य के कारण दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई किए जाने की पुष्टि होती है, तो जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय की जाए।
पत्रकारों का कहना है कि समाचार संकलन, संबंधित पक्षों के बयान लेना और जनहित से जुड़े मुद्दों को सामने लाना पत्रकारिता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में किसी पत्रकार के विरुद्ध कार्रवाई के मामले में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करना आवश्यक है।
शपथ-पत्र और वीडियो बयान की जांच की मांग
बांदा प्रेस ट्रस्ट की ओर से सौंपे गए ज्ञापन में एक व्यक्ति द्वारा पुलिस अधीक्षक को नोटरी शपथ-पत्र देकर प्रकरण को कथित रूप से फर्जी बताए जाने का उल्लेख किया गया है। पत्रकारों ने मांग की है कि संबंधित शपथ-पत्र और उपलब्ध वीडियो बयान को जांच का हिस्सा बनाया जाए, ताकि मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके।
इसके साथ ही प्रारंभिक तहरीर, बाद में दर्ज कराए गए बयानों और विवेचना के दौरान एकत्र किए गए साक्ष्यों का तुलनात्मक परीक्षण कराने की मांग की गई है। पत्रकारों के अनुसार, यदि अलग-अलग बयानों में कोई विरोधाभास सामने आता है, तो उसकी वजह की भी जांच होनी चाहिए।
इसके अलावा घटनास्थल की वास्तविक स्थिति, किसान की जमीन से संबंधित राजस्व अभिलेख, गवाहों के बयान और उपलब्ध वीडियो सहित अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों का परीक्षण कराने की मांग की गई है। इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि विवाद की वास्तविक परिस्थितियां क्या थीं और मुकदमे में लगाए गए आरोपों के समर्थन में कौन-कौन से साक्ष्य उपलब्ध हैं।
सीओ नरैनी की भूमिका की जांच और दूसरे जनपद से विवेचना की मांग
ज्ञापन में क्षेत्राधिकारी नरैनी प्रवीण यादव की भूमिका और विवेचना की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए हैं। बांदा प्रेस ट्रस्ट ने मांग की है कि मामले में धाराओं में बदलाव, एससी/एसटी एक्ट की धाराओं में वृद्धि, साक्ष्य संकलन, गवाहों के बयान और पत्रकार को नोटिस जारी किए जाने की परिस्थितियों की बिंदुवार जांच कराई जाए।
पत्रकारों का तर्क है कि मामले को लेकर उठ रहे सवालों का समाधान तभी संभव है, जब जांच निष्पक्ष तरीके से हो और सभी पक्षों के साक्ष्यों का मूल्यांकन किया जाए। इसी उद्देश्य से उन्होंने मुकदमा संख्या 187/2026 की विवेचना बांदा जनपद से बाहर किसी सक्षम और निष्पक्ष अधिकारी से कराने की मांग की है।
ज्ञापन में जरूरत के अनुसार संबंधित अवधि के कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की विधिसम्मत जांच कराने की बात भी कही गई है। हालांकि, इन सभी पहलुओं पर अंतिम निष्कर्ष जांच में सामने आने वाले तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर ही निकाला जा सकता है।
किसान की जमीन से जुड़े विवाद की भी हो स्वतंत्र जांच
पत्रकारों ने स्पष्ट किया कि मामले की जांच केवल मुकदमे और नोटिस तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। किसान की जमीन पर कथित अवैध कब्जे के प्रयास और भूमि विवाद से जुड़े मूल तथ्यों की भी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।
इसके लिए राजस्व अभिलेखों, जमीन की वास्तविक स्थिति और घटनास्थल से जुड़े साक्ष्यों का परीक्षण कराने की मांग की गई है। पत्रकारों का कहना है कि यदि किसान की जमीन से संबंधित कोई अनियमितता सामने आती है, तो कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। साथ ही, किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध आरोपों की पुष्टि पर्याप्त साक्ष्यों के आधार पर ही होनी चाहिए।
दरअसल, इस प्रकरण में दो महत्वपूर्ण पहलू सामने हैं। पहला, किसान की जमीन से जुड़े विवाद की वास्तविकता और दूसरा, पुलिस विवेचना तथा पत्रकार के विरुद्ध जारी नोटिस की परिस्थितियां। इसलिए दोनों पहलुओं की निष्पक्ष जांच से ही पूरे मामले की स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
बांदा प्रेस ट्रस्ट के साथ एकजुट हुए पत्रकार
ज्ञापन सौंपने के दौरान बांदा प्रेस ट्रस्ट के ट्रस्टी अनिल तिवारी, संगठन प्रमुख अनिल सिंह गौतम, कार्यकारी जिला अध्यक्ष अंशू गुप्ता, वरिष्ठ पत्रकार केके गुप्ता, ट्रस्टी नवीन मिश्रा, आशा, वरिष्ठ पत्रकार आत्माराम त्रिपाठी, दिलीप द्विवेदी, रमाकांत तिवारी, दिलीप जैन और राममिलन सहित दर्जनों पत्रकार मौजूद रहे।
सभी ने मामले की निष्पक्ष जांच कराने, विवेचना दूसरे जनपद से कराए जाने और ज्ञापन में उठाए गए सवालों का जवाब साक्ष्यों के आधार पर सामने लाने की मांग की। पत्रकारों ने यह भी कहा कि यदि जांच में किसी अधिकारी द्वारा पद के दुरुपयोग या दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई की पुष्टि होती है, तो संबंधित के विरुद्ध नियमानुसार विभागीय और कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।
निष्पक्ष जांच से सामने आएंगे वास्तविक तथ्य
बांदा प्रेस ट्रस्ट की मांग है कि मुकदमा संख्या 187/2026 की जांच पारदर्शी और साक्ष्य आधारित तरीके से कराई जाए। किसान की जमीन से जुड़े विवाद का समाधान कानून के अनुसार हो और पत्रकार रामकिशोर उपाध्याय के विरुद्ध कार्रवाई के आधार की भी निष्पक्ष पड़ताल की जाए।
फिलहाल, ज्ञापन में लगाए गए आरोपों और उठाए गए सवालों पर संबंधित पुलिस अधिकारियों का आधिकारिक पक्ष सामने आना महत्वपूर्ण है। जांच पूरी होने से पहले किसी भी आरोप को प्रमाणित तथ्य मानना उचित नहीं होगा। ऐसे में निष्पक्ष विवेचना ही यह स्पष्ट कर सकेगी कि भूमि विवाद की वास्तविक स्थिति क्या है और पुलिस कार्रवाई में किसी प्रकार की अनियमितता हुई है या नहीं।

