श्री राम जी ने किया था शारदीय नवरात्र का आरम्भ तब जाकर मिला था मां दुर्गा की आराधना दिव्य अस्त्र, पढ़िए पौराणिक कथा

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विजयदशमी 2026: हिंदू धर्म में विजयदशमी का पर्व बुराई पर अच्छाई और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक माना जाता है। इस दिन भगवान श्रीराम द्वारा रावण का वध किए जाने की परंपरागत कथा का स्मरण किया जाता है। वहीं, नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा की पूजा और आराधना का भी विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, लंका युद्ध के समय भगवान श्रीराम ने रावण पर विजय प्राप्त करने के लिए देवी शक्ति की उपासना की थी। इस कथा में 108 कमल पुष्प, श्रीराम के कमलनयन स्वरूप और मां दुर्गा की कृपा का विशेष उल्लेख मिलता है।

आइए जानते हैं विजयदशमी से जुड़ी इस पौराणिक कथा के बारे में और समझते हैं कि यह पर्व हमें क्या संदेश देता है।

लंका युद्ध के दौरान ब्रह्मा जी ने श्रीराम को दी देवी आराधना की सलाह

पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान श्रीराम और रावण के बीच लंका में युद्ध चल रहा था, तब रावण को पराजित करना एक बड़ी चुनौती थी। रावण शक्तिशाली होने के साथ-साथ अनेक दिव्य शक्तियों और वरदानों से संपन्न था। ऐसे में रावण पर विजय प्राप्त करने के लिए भगवान श्रीराम ने देवी शक्ति की आराधना की।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ब्रह्मा जी ने श्रीराम को मां दुर्गा की उपासना करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने की सलाह दी। इसके बाद भगवान श्रीराम ने विधि-विधान से देवी की पूजा करने का संकल्प लिया। उनका उद्देश्य मां दुर्गा को प्रसन्न करके धर्म की स्थापना के लिए शक्ति और आशीर्वाद प्राप्त करना था।

इस प्रसंग से यह संदेश मिलता है कि कठिन परिस्थितियों में धैर्य, श्रद्धा और आत्मविश्वास बनाए रखना आवश्यक है। साथ ही, किसी भी महत्वपूर्ण कार्य को पूरा करने के लिए संकल्प और साधना का विशेष महत्व होता है।

108 कमल पुष्पों से की मां दुर्गा की आराधना

कथा के अनुसार, भगवान श्रीराम ने मां दुर्गा की पूजा के लिए 108 कमल पुष्पों की व्यवस्था की थी। इन पुष्पों को देवी के चरणों में अर्पित करके वह पूरी श्रद्धा के साथ आराधना कर रहे थे। पूजा का उद्देश्य मां दुर्गा को प्रसन्न करना और उनसे विजय का आशीर्वाद प्राप्त करना था।

हालांकि, इसी दौरान रावण ने श्रीराम की पूजा में विघ्न डालने की योजना बनाई। कथा में वर्णन मिलता है कि रावण ने अपनी माया से पूजा के लिए रखे गए कमल पुष्पों में से एक पुष्प गायब करवा दिया। इस कारण पूजा के लिए 108 के स्थान पर केवल 107 कमल पुष्प ही शेष रह गए।

जब भगवान श्रीराम को इस बात का पता चला, तो उन्होंने पूजा का संकल्प अधूरा नहीं छोड़ने का निश्चय किया। उनके लिए पूजा में सभी पुष्पों का अर्पण करना महत्वपूर्ण था। इसलिए उन्होंने मां दुर्गा के प्रति अपनी अटूट श्रद्धा प्रकट करने का निर्णय लिया।

कमल पुष्प की जगह नेत्र अर्पित करने चले श्रीराम

पौराणिक कथा में भगवान श्रीराम को कमलनयन कहा गया है, अर्थात ऐसे नेत्र जिनकी तुलना कमल से की जाती है। जब पूजा के लिए एक कमल पुष्प कम पड़ा, तो श्रीराम ने विचार किया कि उनके नेत्र भी कमल के समान हैं। इसलिए वह अपने एक नेत्र को देवी के चरणों में अर्पित करके पूजा का संकल्प पूरा कर सकते हैं।

कथा के अनुसार, भगवान श्रीराम ने अपना नेत्र अर्पित करने के लिए बाण उठाया। यह उनकी भक्ति, समर्पण और दृढ़ निश्चय का प्रतीक माना जाता है। श्रीराम के इस अद्वितीय भाव से मां दुर्गा प्रसन्न हो गईं और तत्काल प्रकट होकर उन्हें ऐसा करने से रोक दिया।

मां दुर्गा ने श्रीराम की भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद दिया। इस प्रकार उनकी आराधना सफल हुई और उन्हें देवी की कृपा प्राप्त हुई। यह प्रसंग बताता है कि सच्ची श्रद्धा का अर्थ केवल पूजा की सामग्री जुटाना नहीं, बल्कि मन की निष्ठा, समर्पण और संकल्प को बनाए रखना भी है।

मां दुर्गा की कृपा से श्रीराम को मिला दिव्य अस्त्र

धार्मिक कथा के अनुसार, मां दुर्गा ने भगवान श्रीराम को रावण पर विजय प्राप्त करने के लिए दिव्य शक्ति और अस्त्र का आशीर्वाद दिया। देवी की कृपा प्राप्त करने के बाद श्रीराम ने नए उत्साह और आत्मविश्वास के साथ युद्ध जारी रखा।

आखिरकार, भगवान श्रीराम ने रावण को पराजित किया। इस घटना को धर्म की अधर्म पर विजय के रूप में देखा जाता है। हालांकि, अलग-अलग रामायणों और क्षेत्रीय परंपराओं में इस प्रसंग के विवरण में अंतर मिल सकता है। इसलिए 108 कमल पुष्प और नेत्र अर्पण की कथा को धार्मिक परंपरा में प्रचलित प्रसंग के रूप में समझना चाहिए।

इस कथा का एक महत्वपूर्ण संदेश यह भी है कि शक्ति और सामर्थ्य का उपयोग धर्म, न्याय और लोककल्याण के लिए किया जाना चाहिए। मां दुर्गा की आराधना और भगवान श्रीराम का आदर्श इसी भावना को मजबूत करते हैं।

अश्विन मास की दशमी को मनाई जाती है विजयदशमी

हिंदू पंचांग के अनुसार, विजयदशमी या दशहरा अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। परंपरागत मान्यता है कि इसी दिन भगवान श्रीराम ने रावण पर विजय प्राप्त की थी। इसलिए इस पर्व को विजयदशमी कहा जाता है।

देश के विभिन्न हिस्सों में दशहरा अलग-अलग परंपराओं के साथ मनाया जाता है। कई स्थानों पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है। वहीं, मैसूर सहित दक्षिण भारत के कई क्षेत्रों में दशहरा देवी की आराधना और सांस्कृतिक उत्सवों से जुड़ा है। बंगाल और आसपास के क्षेत्रों में दुर्गा पूजा के समापन के साथ विजयादशमी का विशेष महत्व होता है।

इस प्रकार विजयदशमी भगवान श्रीराम की विजय और मां दुर्गा की शक्ति, दोनों से जुड़ी धार्मिक भावनाओं को अभिव्यक्त करती है।

विजयदशमी का संदेश: अहंकार छोड़कर अपनाएं सत्य और धर्म का मार्ग

विजयदशमी केवल एक धार्मिक त्योहार नहीं, बल्कि जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने की प्रेरणा भी है। भगवान श्रीराम का चरित्र मर्यादा, सत्य, धैर्य और कर्तव्यपालन का संदेश देता है। वहीं, मां दुर्गा की उपासना साहस, शक्ति और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा देती है।

रावण वध की कथा यह सिखाती है कि अहंकार और अधर्म चाहे कितने ही शक्तिशाली क्यों न दिखाई दें, उनका अंत निश्चित माना जाता है। इसके साथ ही श्रीराम की देवी आराधना बताती है कि कठिन समय में श्रद्धा और संकल्प व्यक्ति को आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।

इस विजयदशमी पर हमें अपने भीतर के क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या और नकारात्मकता को दूर करने का संकल्प लेना चाहिए। यही इस पर्व की सार्थकता है और यही भगवान श्रीराम तथा मां दुर्गा की आराधना का व्यापक संदेश भी है।

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

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