कानपुर नगर निगम भ्रष्टाचार मामले में मंडलायुक्त सख्त, 3 सदस्यीय समिति करेगी जांच
Digital UP News Desk
कानपुर। कानपुर नगर निगम से जुड़े कथित भ्रष्टाचार और टेंडर प्रक्रिया में अनियमितताओं के मामले को लेकर प्रशासन ने सख्त रुख अपनाया है। मंडलायुक्त ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की है। यह समिति नगर निगम में ठेकेदारी, टेंडर प्रक्रिया और निर्माण कार्यों से संबंधित शिकायतों की विस्तृत जांच करेगी। जांच समिति की अध्यक्षता मुख्य विकास अधिकारी (CDO) करेंगे, जबकि लोक निर्माण विभाग (PWD) और ग्रामीण अभियंत्रण विभाग के अधिकारी भी समिति में शामिल किए गए हैं।
प्रशासन की इस कार्रवाई के बाद नगर निगम से जुड़े ठेकेदारों, कर्मचारियों और अन्य संबंधित लोगों में हलचल बढ़ गई है। खास तौर पर टेंडर प्रक्रिया में कथित तौर पर कार्टेल बनाने और प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करने के आरोपों को गंभीरता से लिया जा रहा है। वहीं, पुलिस ने मामले में सामने आए आरोपियों के आपराधिक इतिहास की भी पड़ताल शुरू कर दी है।
तीन सदस्यीय समिति करेगी पूरे मामले की जांच
मंडलायुक्त के निर्देश पर गठित तीन सदस्यीय जांच समिति नगर निगम से जुड़े विभिन्न पहलुओं की पड़ताल करेगी। समिति की अध्यक्षता CDO द्वारा की जाएगी। इसके अलावा PWD और ग्रामीण अभियंत्रण विभाग के अधिकारियों को भी जांच में शामिल किया गया है। इसका उद्देश्य जांच को तकनीकी और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर मजबूत बनाना है।
समिति नगर निगम में कराए गए निर्माण कार्यों, ठेके देने की प्रक्रिया, टेंडर जारी करने और उनके आवंटन से जुड़े रिकॉर्ड की जांच करेगी। इसके साथ ही यह भी देखा जाएगा कि कहीं नियमों की अनदेखी करके किसी विशेष व्यक्ति या समूह को लाभ पहुंचाने का प्रयास तो नहीं किया गया।
प्रशासन का फोकस केवल आरोपों की पुष्टि तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दस्तावेजों, टेंडर रिकॉर्ड, निर्माण कार्यों और संबंधित विभागीय प्रक्रियाओं की भी जांच की जाएगी।
टेंडर प्रक्रिया और कथित कार्टेल पर विशेष नजर
मामले में सबसे महत्वपूर्ण बिंदुओं में से एक टेंडर प्रक्रिया में कथित कार्टेल का गठन बताया जा रहा है। आरोप है कि कुछ लोगों ने आपसी समन्वय के जरिए टेंडर प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास किया। यदि जांच में इस तरह की अनियमितता सामने आती है तो संबंधित लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
प्रशासन ने ऐसे लोगों के खिलाफ FIR दर्ज कराने के निर्देश दिए हैं, जिनकी भूमिका टेंडरों में कार्टेल बनाने से जुड़ी पाई जाएगी। इसके अलावा ठेकेदारों और कथित तौर पर भूमि संबंधी गतिविधियों से जुड़े कुछ लोगों के खिलाफ भी नामजद FIR की कार्रवाई की गई है।
हालांकि, जांच पूरी होने के बाद ही आरोपों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी। फिलहाल प्रशासनिक और पुलिस स्तर पर उपलब्ध दस्तावेजों तथा अन्य तथ्यों की जांच की जा रही है।
ठेकेदारों और भू-माफियाओं पर नामजद FIR
मामले में कुछ ठेकेदारों और भू-माफिया के रूप में चिन्हित किए गए लोगों के खिलाफ नामजद FIR दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। पुलिस अब FIR में नामजद लोगों से संबंधित रिकॉर्ड जुटा रही है।
इसके साथ ही पुलिस यह भी पता लगाने में जुटी है कि आरोपियों के खिलाफ पहले से कोई आपराधिक मुकदमा दर्ज है या नहीं। इसके लिए संबंधित थानों और अन्य पुलिस रिकॉर्ड से जानकारी जुटाई जा रही है। यदि किसी आरोपी का पुराना आपराधिक इतिहास सामने आता है तो उसे भी जांच का हिस्सा बनाया जाएगा।
पुलिस की जांच का उद्देश्य मामले से जुड़े सभी तथ्यों को एकत्र करना और आरोपों की वास्तविकता का पता लगाना है। इसके लिए दस्तावेजों के साथ-साथ संबंधित लोगों से पूछताछ भी की जा सकती है।
नगर निगम कर्मचारियों की भूमिका की भी होगी जांच
इस पूरे मामले में नगर निगम के कुछ संदिग्ध कर्मचारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में रखी गई है। प्रशासन यह पता लगाने का प्रयास करेगा कि यदि टेंडर, ठेकेदारी या निर्माण कार्यों में नियमों का उल्लंघन हुआ है तो उसमें विभागीय स्तर पर किसी कर्मचारी या अधिकारी की भूमिका रही या नहीं।
जांच समिति नगर निगम से संबंधित दस्तावेजों और रिकॉर्ड का परीक्षण करेगी। इसमें टेंडर से संबंधित फाइलें, कार्यादेश, निर्माण कार्यों के दस्तावेज और भुगतान प्रक्रिया जैसे महत्वपूर्ण बिंदुओं की जांच की जा सकती है।
यदि जांच में किसी कर्मचारी या अधिकारी की भूमिका संदिग्ध पाई जाती है तो उसके खिलाफ भी नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है। इस तरह जांच का दायरा केवल बाहरी लोगों तक सीमित नहीं रखा गया है।
निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और प्रक्रिया की होगी पड़ताल
समिति नगर निगम द्वारा कराए गए निर्माण कार्यों की प्रक्रिया और उससे जुड़े रिकॉर्ड की भी जांच करेगी। निर्माण कार्यों के लिए टेंडर कैसे जारी हुए, किन एजेंसियों को काम मिला और कार्यों की निगरानी किस स्तर पर की गई, इन सभी बिंदुओं पर जानकारी जुटाई जाएगी।
इसके अलावा निर्माण कार्यों से जुड़े भुगतान और स्वीकृत प्रक्रिया का भी परीक्षण किया जा सकता है। प्रशासन यह सुनिश्चित करना चाहता है कि सार्वजनिक धन से कराए गए कार्यों में निर्धारित नियमों का पालन हुआ हो।
जरूरत पड़ने पर संबंधित तकनीकी अधिकारियों से भी रिपोर्ट ली जा सकती है। इससे निर्माण कार्यों से जुड़ी किसी तकनीकी या वित्तीय अनियमितता की स्थिति स्पष्ट करने में मदद मिलेगी।
पांच दिन में अंतरिम और दस दिन में अंतिम रिपोर्ट
जांच समिति को निर्धारित समय सीमा के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं। समिति को पांच दिन में अंतरिम रिपोर्ट और दस दिन में अंतिम जांच रिपोर्ट सौंपनी होगी।
अंतरिम रिपोर्ट के माध्यम से जांच की शुरुआती स्थिति और सामने आए प्रमुख तथ्यों की जानकारी प्रशासन को दी जाएगी। इसके बाद विस्तृत जांच पूरी करके अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत की जाएगी।
समय सीमा तय किए जाने से संकेत मिलता है कि प्रशासन मामले को लंबित रखने के बजाय तेजी से तथ्यों तक पहुंचना चाहता है। अंतिम रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।
प्रशासन की सख्ती से बढ़ी जिम्मेदारी
नगर निगम जैसे स्थानीय निकायों में विकास कार्यों और टेंडर प्रक्रिया में पारदर्शिता बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऐसे में कथित भ्रष्टाचार और अनियमितताओं से जुड़े आरोपों की निष्पक्ष जांच जरूरी है। प्रशासन द्वारा तकनीकी विभागों के अधिकारियों को जांच समिति में शामिल किए जाने से जांच को विशेषज्ञता मिलने की उम्मीद है।
वहीं, पुलिस द्वारा आरोपियों का आपराधिक इतिहास खंगालने और FIR की कार्रवाई आगे बढ़ाने से मामले का कानूनी पक्ष भी मजबूत होगा। इसके साथ ही नगर निगम कर्मचारियों की भूमिका की जांच से यह स्पष्ट करने में मदद मिल सकती है कि कथित अनियमितताओं में विभागीय स्तर पर किसी प्रकार की लापरवाही या मिलीभगत थी या नहीं।

