ब्रज वैभव अभियान से नई पीढ़ी को जोड़ रही भारतीय आध्यात्मिक विरासत: शैलजाकांत मिश्र
रिपोर्ट- योगेश भारद्वाज
मथुरा। ब्रज की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा को नई पीढ़ी से जोड़ने के उद्देश्य से ‘ब्रज वैभव अभियान’ के अंतर्गत हार्टफुलनेस जन्मभूमि आश्रम, मथुरा में दो दिवसीय आवासीय कार्यक्रम ‘गीतोपदेश—हृदय मम पश्यसि’ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरों के साथ-साथ मध्य प्रदेश और हरियाणा सहित पड़ोसी राज्यों से आए प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। कार्यक्रम में श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों के माध्यम से व्यक्ति की आंतरिक स्थिति को समझने और उसके संदेश को जीवन में उतारने पर विशेष जोर दिया गया।
शैलजाकांत मिश्र ने किया कार्यक्रम का उद्घाटन
कार्यक्रम का उद्घाटन उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद के उपाध्यक्ष शैलजाकांत मिश्र ने किया। इस अवसर पर उन्होंने ‘ब्रज वैभव अभियान एवं श्रीमद्भगवद्गीता’ विषय पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि ब्रज केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि भारत की समृद्ध आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि गीता का संदेश किसी एक काल या परिस्थिति तक सीमित नहीं है। इसके विचार व्यक्ति को जीवन की विभिन्न परिस्थितियों में संतुलन, कर्तव्यबोध और आत्मचिंतन की दिशा प्रदान करते हैं। इसलिए आज की युवा पीढ़ी को भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।
शैलजाकांत मिश्र ने गुरुतत्व पर भी अपने विचार रखे। साथ ही उन्होंने उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद के गठन और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में तीर्थ स्थलों के विकास के लिए किए जा रहे प्रयासों तथा उनके पीछे की भावना को भी प्रतिभागियों के साथ साझा किया।
पुस्तक का हुआ लोकार्पण
उद्घाटन सत्र के दौरान ग्लोबल हार्टफुलनेस गाइड कमलेश डी. पटेल (दाजी) द्वारा लिखित पुस्तक का लोकार्पण भी किया गया। इस अवसर पर कार्यक्रम से जुड़े लोगों ने भारतीय आध्यात्मिक साहित्य और ध्यान परंपरा के महत्व पर चर्चा की।
वहीं, ‘ब्रज वैभव अभियान’ के मथुरा समन्वयक निशांत शर्मा ने विभिन्न केंद्रों से आए प्रतिभागियों का स्वागत किया। उन्होंने कार्यक्रम के उद्देश्य और इसकी रूपरेखा के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि इस तरह के आयोजन लोगों को ब्रज की आध्यात्मिक चेतना और भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ने का प्रभावी माध्यम बन सकते हैं।
श्लोकों के जरिए अंतर्मुखी अनुभव पर जोर
कार्यक्रम का केंद्रीय भाव ‘अंतःस्थिति के दर्पण के रूप में श्लोक’ रहा। इसके तहत प्रतिभागियों को श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों के माध्यम से अपनी आंतरिक स्थिति को समझने के लिए प्रेरित किया गया। कार्यक्रम में इस बात पर विशेष ध्यान दिया गया कि गीता को केवल पढ़ने या सुनने तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उसके संदेश को व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में अनुभव कर सके।
दरअसल, आधुनिक जीवन की व्यस्तता के बीच व्यक्ति अक्सर अपने भीतर झांकने के लिए पर्याप्त समय नहीं निकाल पाता। ऐसे में गीता के श्लोकों और ध्यान आधारित अभ्यासों के माध्यम से आत्मचिंतन की प्रक्रिया को सहज बनाने का प्रयास कार्यक्रम में किया गया।
प्रतिभागियों को यह समझाने का प्रयास किया गया कि गीता के संदेश को जीवन की परिस्थितियों से जोड़कर देखने पर उसके अर्थ और प्रभाव को अधिक गहराई से अनुभव किया जा सकता है।
स्वधर्म से भक्ति तक विभिन्न विषयों पर सत्र
दो दिवसीय आवासीय कार्यक्रम में श्रीमद्भगवद्गीता के विभिन्न पक्षों पर केंद्रित कई सत्र आयोजित किए गए। इनमें गीता का परिचय, स्वधर्म, त्रिगुणात्मक प्रकृति, स्थितप्रज्ञ, त्याग और भक्ति जैसे विषय शामिल रहे।
इन विषयों पर चर्चा के दौरान प्रतिभागियों को गीता के मूल संदेश को व्यवहारिक जीवन से जोड़कर समझने के अवसर मिले। उदाहरण के तौर पर स्वधर्म के विषय के माध्यम से व्यक्ति के कर्तव्य और जिम्मेदारियों पर विचार किया गया, जबकि स्थितप्रज्ञ के संदर्भ में परिस्थितियों के बीच मानसिक संतुलन बनाए रखने की अवधारणा पर चर्चा हुई।
इसी प्रकार त्याग और भक्ति जैसे विषयों को भी केवल धार्मिक अवधारणाओं के रूप में देखने के बजाय उनके व्यावहारिक और आत्मिक पक्ष को समझने का प्रयास किया गया।
ध्यान और चिंतनपरक अभ्यास भी कराए गए
कार्यक्रम में विषय आधारित चर्चा के साथ हार्टफुलनेस ध्यान और चिंतनपरक अभ्यास भी कराए गए। इन अभ्यासों का उद्देश्य प्रतिभागियों को अपने भीतर की भावनाओं, विचारों और अनुभवों को देखने तथा आत्मचिंतन की प्रक्रिया को समझने का अवसर प्रदान करना रहा।
कार्यक्रम के दौरान यह संदेश प्रमुखता से सामने आया कि आध्यात्मिक ज्ञान का वास्तविक महत्व तभी है, जब वह व्यक्ति के व्यवहार और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का आधार बने। इसी दृष्टिकोण से गीता के श्लोकों को प्रतिभागियों के व्यक्तिगत अनुभवों और दैनिक जीवन की परिस्थितियों से जोड़ने का प्रयास किया गया।
ज्ञान को जीवन में उतारने पर जोर
कार्यक्रम का मार्गदर्शन हार्टफुलनेस गीतोपदेश टीम के ऋषि रंजन, गोरख पारुलकर, कृष्णा सचदेवा और रामकृष्ण द्विवेदी ने किया। विभिन्न सत्रों में वक्ताओं ने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता का ज्ञान केवल बौद्धिक समझ तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
उनके अनुसार गीता के संदेश का वास्तविक अनुभव व्यक्ति के जीवन, संबंधों, कर्तव्यों और आंतरिक विकास में दिखाई देना चाहिए। इसलिए कार्यक्रम में श्लोकों की व्याख्या के साथ-साथ उनके व्यावहारिक पक्ष को समझने पर भी ध्यान दिया गया।
वक्ताओं ने यह भी बताया कि व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में आने वाली परिस्थितियों के बीच गीता के संदेश को किस प्रकार आत्मचिंतन और संतुलन के आधार के रूप में देख सकता है। इस प्रकार कार्यक्रम में आध्यात्मिक ज्ञान और व्यवहारिक जीवन के बीच संबंध स्थापित करने का प्रयास किया गया।
भारतीय ज्ञान परंपरा से नई पीढ़ी को जोड़ने की पहल
कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने कहा कि ‘ब्रज वैभव अभियान’ का उद्देश्य केवल ब्रज के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक वैभव को सामने लाना नहीं है। इसके साथ ही यह अभियान भारतीय ज्ञान-परंपरा और आध्यात्मिक विरासत को नई पीढ़ी से जोड़ने की दिशा में भी महत्वपूर्ण प्रयास है।
ब्रज की भूमि श्रीकृष्ण की लीलाओं, भक्ति परंपरा और भारतीय आध्यात्मिक चिंतन से गहराई से जुड़ी रही है। ऐसे में श्रीमद्भगवद्गीता पर केंद्रित कार्यक्रमों के माध्यम से इस विरासत को वर्तमान पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास विशेष महत्व रखता है।
वक्ताओं के मुताबिक, बदलते समय में युवाओं को भारतीय परंपराओं से जोड़ने के लिए केवल जानकारी देना पर्याप्त नहीं है। बल्कि उन्हें इन परंपराओं के मूल विचारों को समझने और अपने जीवन में अनुभव करने का अवसर भी मिलना चाहिए। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए ‘गीतोपदेश—हृदय मम पश्यसि’ जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।
प्रतिभागियों ने लिया आध्यात्मिक अनुभव
दो दिवसीय कार्यक्रम में अलग-अलग स्थानों से आए प्रतिभागियों ने सहभागिता की। आवासीय स्वरूप होने के कारण प्रतिभागियों को विभिन्न सत्रों, ध्यान अभ्यासों और चिंतनपरक गतिविधियों में लगातार शामिल होने का अवसर मिला।
कार्यक्रम के दौरान आध्यात्मिक चिंतन के साथ प्रतिभागियों के बीच संवाद और अनुभव साझा करने की प्रक्रिया भी देखने को मिली। इससे गीता के संदेश को व्यक्तिगत अनुभवों से जोड़ने में सहायता मिली।
इस अवसर पर अर्चना अष्टकार, रेखा अग्रवाल, शोभिता श्रीवास्तव, प्रियदर्शनी सक्सेना, बिमला देवी, सुरेंद्र शर्मा, विशाल शर्मा, एम.एस. सोलंकी, एस.एस. भारद्वाज, रंजीत, संजय और जे.पी. सिंह सहित अनेक गणमान्यजन एवं प्रतिभागी उपस्थित रहे।
आध्यात्मिक विरासत को अनुभव से जोड़ने का संदेश
कुल मिलाकर, ‘गीतोपदेश—हृदय मम पश्यसि’ कार्यक्रम ने श्रीमद्भगवद्गीता के संदेश को व्यक्ति की आंतरिक यात्रा और दैनिक जीवन से जोड़ने पर केंद्रित दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में यह विचार प्रमुख रहा कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा केवल इतिहास या ग्रंथों का विषय नहीं है, बल्कि आज भी व्यक्ति के जीवन को दिशा देने वाली ज्ञान परंपरा है।

