विश्व स्ट्रोक दिवस: ब्रेन स्ट्रोक में हर मिनट होता है अहम, समय पर इलाज से बच सकती है जान – जरूर पढ़ें ख़ास जानकारी
रिपोर्ट – हनुमंत सिंह
कानपुर: ब्रेन स्ट्रोक यानी मस्तिष्क में रक्त प्रवाह बाधित होने की स्थिति में समय पर इलाज मिलना बेहद जरूरी है। शुरुआती लक्षणों को पहचानकर मरीज को तुरंत अस्पताल पहुंचाने से जान बचाने और स्थायी विकलांगता के खतरे को कम करने में मदद मिल सकती है। इसी उद्देश्य से विश्व स्ट्रोक दिवस के अवसर पर पारस हेल्थ, कानपुर की ओर से लोगों को जागरूक करने के लिए विशेष अभियान चलाया जा रहा है। इस अभियान के माध्यम से स्ट्रोक के लक्षणों की पहचान, समय पर चिकित्सकीय सहायता और इलाज के महत्व के बारे में जानकारी दी जा रही है।
हर साल 29 अक्टूबर को विश्व स्ट्रोक दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष की थीम “एवरी मिनट काउंट्स” यानी “हर मिनट मायने रखता है” है। इसका मुख्य संदेश यह है कि स्ट्रोक के लक्षण सामने आने के बाद इलाज में देरी नहीं करनी चाहिए। इसलिए मरीज और उसके आसपास मौजूद लोगों को शुरुआती संकेतों की जानकारी होना आवश्यक है।
विश्व स्ट्रोक दिवस पर जागरूकता अभियान
विश्व स्ट्रोक दिवस का उद्देश्य लोगों को स्ट्रोक के जोखिम, लक्षणों और उपचार के बारे में जागरूक करना है। इसी क्रम में पारस हेल्थ, कानपुर की ओर से 23 से 28 अक्टूबर तक विभिन्न गतिविधियों की योजना बनाई गई है। इनमें स्वास्थ्य शिविर, जागरूकता कार्यक्रम और अस्पताल के स्टाफ के लिए विशेष प्रशिक्षण एवं सर्टिफिकेशन शामिल हैं।
अस्पताल के न्यूरोलॉजी विभाग के निदेशक डॉ. प्रदीप कुमार के निर्देशन में चलाए जा रहे इस अभियान के तहत स्ट्रोक की स्थिति में त्वरित कार्रवाई के महत्व पर जोर दिया जा रहा है। इसके साथ ही, लोगों को यह समझाने का प्रयास किया जा रहा है कि अचानक दिखाई देने वाले न्यूरोलॉजिकल लक्षणों को सामान्य परेशानी मानकर टालना उचित नहीं है।
दरअसल, स्ट्रोक में मस्तिष्क के किसी हिस्से तक रक्त की आपूर्ति बाधित हो सकती है या मस्तिष्क में रक्तस्राव हो सकता है। ऐसी स्थिति में मस्तिष्क की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है। इसलिए लक्षणों की पहचान के साथ-साथ सही समय पर अस्पताल पहुंचना भी उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
क्या हैं ब्रेन स्ट्रोक के प्रमुख लक्षण?
ब्रेन स्ट्रोक के लक्षण अक्सर अचानक दिखाई देते हैं। हालांकि, हर मरीज में लक्षण एक जैसे हों, यह जरूरी नहीं है। इसलिए कुछ प्रमुख संकेतों को पहचानना सभी के लिए उपयोगी हो सकता है।
- चेहरे का एक तरफ झुकना: मुस्कुराने पर चेहरे का एक हिस्सा असामान्य दिखाई देना।
- हाथ या पैर में कमजोरी: शरीर के एक तरफ अचानक कमजोरी या सुन्नपन महसूस होना।
- बोलने में परेशानी: शब्द स्पष्ट न बोल पाना, बात समझने में कठिनाई होना या अचानक बोलने में समस्या आना।
- देखने में परेशानी: अचानक धुंधला दिखाई देना या दृष्टि में बदलाव महसूस होना।
- संतुलन बिगड़ना: अचानक चक्कर आना, चलने में परेशानी या शरीर का संतुलन बनाए रखने में कठिनाई होना।
- अचानक तेज सिरदर्द: विशेषकर ऐसा असामान्य और गंभीर सिरदर्द, जो बिना स्पष्ट कारण के शुरू हो।
यदि इनमें से कोई भी लक्षण अचानक दिखाई दे, तो मरीज को तत्काल आपातकालीन चिकित्सा सहायता दिलानी चाहिए। लक्षण कुछ देर में ठीक हो जाएं, तब भी उन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह अस्थायी रूप से रक्त प्रवाह बाधित होने का संकेत हो सकता है।
शुरुआती साढ़े चार घंटे क्यों हैं महत्वपूर्ण?
स्ट्रोक के उपचार में समय की विशेष भूमिका होती है। विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ उपयुक्त मरीजों में लक्षण शुरू होने के शुरुआती साढ़े चार घंटे के भीतर जांच के बाद क्लॉट बस्टर दवा दी जा सकती है। यह उपचार मस्तिष्क की रक्त वाहिका में बने थक्के को घोलने और रक्त प्रवाह बहाल करने में मदद कर सकता है।
हालांकि, यह उपचार हर मरीज के लिए उपयुक्त नहीं होता। इसके लिए चिकित्सकीय जांच, मस्तिष्क की इमेजिंग और अन्य जरूरी मानकों का आकलन किया जाता है। इसलिए मरीज को घर पर दवा देने या अपनी तरफ से इलाज करने के बजाय तुरंत ऐसे अस्पताल पहुंचाना चाहिए, जहां स्ट्रोक का उचित मूल्यांकन और उपचार उपलब्ध हो।
इसके अतिरिक्त, कुछ मरीजों में बड़े रक्त थक्के को हटाने के लिए विशेष प्रक्रिया की जरूरत पड़ सकती है। यह निर्णय मरीज की स्थिति, जांच के परिणाम और लक्षण शुरू होने के समय को ध्यान में रखकर विशेषज्ञ चिकित्सक लेते हैं। इसलिए अस्पताल पहुंचने में देरी नहीं करना महत्वपूर्ण है।
इलाज के बाद न्यूरो रिहैबिलिटेशन की भूमिका
स्ट्रोक का उपचार केवल शुरुआती आपातकालीन देखभाल तक सीमित नहीं है। मरीज की स्थिति स्थिर होने के बाद पुनर्वास यानी न्यूरो रिहैबिलिटेशन भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसके माध्यम से मरीज को चलने-फिरने, हाथ-पैर की गतिविधियों, बोलने और रोजमर्रा के काम करने की क्षमता बेहतर करने में सहायता मिल सकती है।
रिहैबिलिटेशन की प्रक्रिया मरीज की जरूरतों के अनुसार तय की जाती है। इसमें फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी और अन्य विशेषज्ञ सेवाएं शामिल हो सकती हैं। हालांकि, सुधार की गति और परिणाम स्ट्रोक की गंभीरता, प्रभावित मस्तिष्क के हिस्से तथा मरीज की समग्र स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करते हैं।
इसलिए इलाज के बाद चिकित्सकीय सलाह का पालन करना, नियमित फॉलो-अप कराना और पुनर्वास कार्यक्रम में भाग लेना भी जरूरी है।
स्ट्रोक से बचाव के लिए जीवनशैली पर दें ध्यान
स्ट्रोक के सभी मामलों को रोका नहीं जा सकता, लेकिन कुछ जोखिम कारकों को नियंत्रित करके इसकी आशंका कम की जा सकती है। उच्च रक्तचाप, मधुमेह, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल, धूम्रपान, शारीरिक गतिविधि की कमी और कुछ हृदय रोग स्ट्रोक के जोखिम को बढ़ा सकते हैं।
ऐसे में नियमित स्वास्थ्य जांच कराना, रक्तचाप और रक्त शर्करा को नियंत्रित रखना, संतुलित आहार लेना और डॉक्टर की सलाह के अनुसार शारीरिक गतिविधि करना उपयोगी हो सकता है। इसके अलावा, धूम्रपान से दूरी बनाना और निर्धारित दवाओं का नियमित सेवन करना भी महत्वपूर्ण है।
हर मिनट मायने रखता है, लक्षण दिखें तो तुरंत लें मदद
विश्व स्ट्रोक दिवस के अवसर पर पारस हेल्थ, कानपुर की ओर से चलाया जा रहा जागरूकता अभियान लोगों को समय पर लक्षण पहचानने और उचित चिकित्सा सहायता लेने का संदेश देता है। अभियान के तहत स्वास्थ्य शिविरों, जागरूकता कार्यक्रमों और अस्पताल के स्टाफ के प्रशिक्षण के माध्यम से स्ट्रोक के प्रति समझ बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
डॉक्टरों की अपील है कि चेहरे का एक तरफ झुकना, हाथ-पैर में अचानक कमजोरी या बोलने में परेशानी जैसे लक्षणों को अनदेखा न करें। ऐसे संकेत दिखाई देते ही स्थानीय आपातकालीन सेवा से संपर्क करें और मरीज को तुरंत अस्पताल पहुंचाएं। लक्षण शुरू होने का समय याद रखें और चिकित्सकों को इसकी जानकारी दें। ब्रेन स्ट्रोक में समय पर पहचान और त्वरित उपचार मरीज की जान बचाने तथा दीर्घकालिक विकलांगता का खतरा कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

