मेरठ सदर दुर्गाबाड़ी में संपन्न हुआ 220वां दुर्गा पूजा महोत्सव, नम आंखों से मां को दी गई विदाई
रिपोर्ट- मनीष पराशर
मेरठ। मेरठ के सदर स्थित ऐतिहासिक दुर्गाबाड़ी में 220वें दुर्गा पूजा महोत्सव का भव्य समापन हो गया। पांच दिनों तक चले इस पारंपरिक और धार्मिक आयोजन में बंगाली समाज के लोगों सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया। महोत्सव के अंतिम दिन विजयादशमी पर मां दुर्गा को विदाई दी गई। इस दौरान जहां एक ओर श्रद्धालुओं ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ उत्सव मनाया, वहीं दूसरी ओर मां की विदाई के समय भक्तों की आंखें नम हो गईं।
220वें वार्षिक दुर्गा पूजा महोत्सव ने एक बार फिर मेरठ में धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक परंपरा और सामाजिक एकता की सुंदर तस्वीर प्रस्तुत की। पूरे आयोजन के दौरान मंदिर परिसर में भक्तिमय वातावरण बना रहा। मां दुर्गा की आराधना, पारंपरिक अनुष्ठानों और सांस्कृतिक गतिविधियों ने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया।
सप्तमी से विजयादशमी तक हुए पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान
दुर्गाबाड़ी में दुर्गा पूजा महोत्सव की शुरुआत सप्तमी से हुई थी। इसके बाद लगातार पांच दिनों तक मां दुर्गा की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई। प्रतिदिन भव्य आरती के साथ अन्य धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए। इसके अलावा धुनुची नृत्य, संधि पूजा और नाडु के भोग जैसे पारंपरिक कार्यक्रमों ने महोत्सव की विशेष छटा बिखेरी।
बंगाली संस्कृति में दुर्गा पूजा का विशेष महत्व है। यह पर्व केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवारों, रिश्तों और समाज को जोड़ने का माध्यम भी बनता है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए दुर्गाबाड़ी में श्रद्धालुओं ने पूरे उत्साह के साथ पूजा में भाग लिया।
वहीं, विजयादशमी के अवसर पर मां दुर्गा की विदाई की तैयारियां की गईं। इस दौरान श्रद्धालुओं ने मां से परिवार की सुख-समृद्धि, खुशहाली और कल्याण की कामना की। जैसे-जैसे विदाई का समय नजदीक आया, वैसे-वैसे मंदिर परिसर में भावुकता का माहौल भी गहराने लगा।
सिंदूर खेला में सुहागिन महिलाओं ने निभाई परंपरा
महोत्सव के अंतिम दिन सिंदूर खेला मुख्य आकर्षण रहा। इस पारंपरिक रस्म में विवाहित महिलाओं ने सबसे पहले मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित किया। इसके बाद एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर अखंड सौभाग्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना की।
बंगाली परंपरा में सिंदूर खेला का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व माना जाता है। मान्यता के अनुसार, मां दुर्गा अपने मायके से विदा होकर कैलाश लौटती हैं। ऐसे में उनकी विदाई को बेटी की विदाई के रूप में भी देखा जाता है। यही कारण है कि इस रस्म में खुशी और भावुकता दोनों का अनूठा संगम दिखाई देता है।
सिंदूर खेला में शामिल महिलाओं ने मां दुर्गा के प्रति अपनी गहरी आस्था व्यक्त की। उनके अनुसार, यह परंपरा न केवल धार्मिक विश्वास को मजबूत करती है, बल्कि महिलाओं के बीच आपसी प्रेम, सौहार्द और एकजुटता का संदेश भी देती है।
दस वर्षों से महोत्सव में शामिल हो रहीं कनिका
महोत्सव में शामिल श्रद्धालु कनिका ने बताया कि वह पिछले दस वर्षों से दुर्गाबाड़ी में पूजा करने आ रही हैं। मूल रूप से पंजाबी होने के बावजूद उनका बंगाली समाज और यहां की सांस्कृतिक परंपराओं से विशेष जुड़ाव है।
उन्होंने कहा कि दुर्गाबाड़ी में आकर पूजा करना और सिंदूर खेला की रस्म में शामिल होना उन्हें बहुत अच्छा लगता है। उनके अनुसार, मां दुर्गा की विदाई के बाद मंदिर परिसर खाली-खाली महसूस होता है। हालांकि, अगले वर्ष मां के फिर से आगमन की उम्मीद मन में खुशी भर देती है।
कनिका की तरह ही यहां आने वाले अन्य श्रद्धालुओं के लिए भी दुर्गा पूजा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव का अवसर है। हर वर्ष इस महोत्सव में शामिल होना और पुरानी परंपराओं को निभाना उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
अपूर्वा मुखर्जी और लिपिका ने साझा किए भावुक अनुभव
श्रद्धालु अपूर्वा मुखर्जी ने बताया कि विजयादशमी के दिन मां दुर्गा का विसर्जन होने से पहले सिंदूर खेला की रस्म निभाई गई। उन्होंने कहा कि इस परंपरा में विवाहित महिलाएं पहले मां को सिंदूर अर्पित करती हैं और फिर एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं। उनके अनुसार, मां दुर्गा कुछ दिनों के लिए आती हैं और जल्द ही विदा हो जाती हैं। इसलिए यह दिन सभी श्रद्धालुओं के लिए भावुक होता है।
वहीं, लिपिका चौधरी ने मां दुर्गा की विदाई की तुलना घर की बेटी की विदाई से की। उन्होंने बताया कि जब बेटी मायके से ससुराल जाती है, तो परिवार के सदस्य खुशी के साथ भावुकता भी महसूस करते हैं। इसी तरह मां दुर्गा की विदाई का क्षण भी श्रद्धालुओं के लिए खास होता है।
लिपिका ने कहा कि मां से यही प्रार्थना है कि अगले वर्ष भी सभी लोग इसी तरह हंसी-खुशी मिलकर महोत्सव मनाएं और परिवारों में सुख-समृद्धि बनी रहे। इस दौरान सुषमा मुखर्जी सहित अन्य श्रद्धालुओं की मौजूदगी ने आयोजन को और भी भावपूर्ण बना दिया।
संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखना महोत्सव का उद्देश्य
दुर्गाबाड़ी के प्रधान सचिव अभय मुखर्जी ने बताया कि पांच दिवसीय दुर्गा पूजा महोत्सव सप्तमी से शुरू होकर विजयादशमी तक धूमधाम से मनाया जाता है। इस दौरान मां दुर्गा की आराधना के साथ धुनुची नृत्य और अन्य पारंपरिक धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
वहीं, सुब्रतो सेन ने बताया कि 220वें वार्षिक महोत्सव का प्रमुख उद्देश्य प्राचीन संस्कृति और परंपराओं को संरक्षित रखते हुए अगली पीढ़ी तक पहुंचाना है। उन्होंने सिंदूर खेला को इस आयोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए कहा कि यह रस्म आपसी सौहार्द, सामाजिक एकता और पारिवारिक मूल्यों का संदेश देती है।
सांस्कृतिक एकता की मिसाल बना 220वां दुर्गा पूजा महोत्सव
दुर्गाबाड़ी में आयोजित इस महोत्सव का समापन धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक उल्लास के बीच हुआ। आयोजन में शामिल श्रद्धालुओं ने मां दुर्गा को भावपूर्ण विदाई देते हुए अगले वर्ष फिर से उनके आगमन की कामना की।

