लखीमपुर मेले पर विवाद का असर, दुकानों की रौनक थमी; कारोबारियों को नुकसान की चिंता

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रिपोर्ट- शरद अवस्थी

लखीमपुर खीरी। लखीमपुर खीरी में दशहरा से धनतेरस तक लगने वाले पारंपरिक मेले की रौनक इस बार विवाद के चलते फीकी पड़ती नजर आ रही है। हर साल मेले में करीब 230 दुकानें लगती हैं, जहां खरीदारी के साथ मनोरंजन और उत्सव का माहौल देखने को मिलता है। हालांकि, इस बार झूले लगाने की तैयारियां शुरू होने के बावजूद दुकानों को लेकर असमंजस बना हुआ है। इससे दुकानदारों की चिंता बढ़ गई है और शहरवासियों को भी मेले की रौनक प्रभावित होने की आशंका सता रही है।

मेले को लेकर नगर पालिका और सेठ गया प्रसाद ट्रस्ट के बीच अधिकारों एवं जिम्मेदारियों को लेकर मतभेद सामने आए हैं। इस विवाद के केंद्र में वर्ष 1938 का लिखित समझौता है। दोनों पक्षों की ओर से इस समझौते के प्रावधानों को लेकर अलग-अलग बातें सामने आ रही हैं। नतीजतन, मेले में दुकानें लगाने की प्रक्रिया प्रभावित हो रही है और कारोबारियों को यह समझ नहीं आ रहा कि उन्हें दुकान लगाने के लिए पर्याप्त समय मिल पाएगा या नहीं।

दशहरा से धनतेरस तक मेले में लगती हैं करीब 230 दुकानें

लखीमपुर का यह पारंपरिक मेला स्थानीय लोगों के लिए खास महत्व रखता है। दशहरा से धनतेरस तक चलने वाले इस आयोजन में विभिन्न प्रकार की दुकानें लगती हैं। त्योहारों के दौरान खरीदारी बढ़ने से दुकानदारों को अच्छी बिक्री की उम्मीद रहती है। इसके अलावा, मेला शहर के उत्सवी माहौल को भी खास बनाता है।

लेकिन इस बार दुकानें लगाने को लेकर स्पष्ट स्थिति नहीं बनने से कारोबारियों की उम्मीदों पर असर पड़ रहा है। दुकानदारों का कहना है कि त्योहारों का सीमित समय उनके कारोबार के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। यदि दुकानें लगाने में देरी होती है, तो बिक्री के लिए मिलने वाला समय कम हो जाएगा। ऐसे में दुकान का किराया, कर्मचारियों का खर्च और अन्य लागत निकालना मुश्किल हो सकता है।

इसी वजह से दुकानदार चाहते हैं कि नगर पालिका और ट्रस्ट के बीच चल रहे विवाद का जल्द समाधान निकाला जाए, ताकि उन्हें समय रहते दुकान लगाने की अनुमति और पर्याप्त अवधि मिल सके।

1938 के समझौते में क्या है व्यवस्था?

नगर पालिका अध्यक्ष डॉ. इरा श्रीवास्तव के मुताबिक, वर्ष 1938 में हुए लिखित समझौते में जमीन की जिम्मेदारी और किराया वसूली की व्यवस्था निर्धारित की गई थी। उनके अनुसार, साल के 11 महीने जमीन की जिम्मेदारी और किराया वसूली का अधिकार सेठ गया प्रसाद ट्रस्ट के पास रहता है, जबकि एक महीने के लिए यह जिम्मेदारी नगर पालिका के पास होती है।

डॉ. श्रीवास्तव के अनुसार, इसी एक महीने की अवधि में मेला लगवाने और दुकानदारों से किराया वसूलने की जिम्मेदारी नगर पालिका की है। उन्होंने बताया कि समझौते के तहत मेले से होने वाली आय में 75 प्रतिशत हिस्सा नगर पालिका और 25 प्रतिशत हिस्सा ट्रस्ट को मिलना निर्धारित है।

नगर पालिका अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि प्रशासन की ओर से हर साल की तरह इस बार भी मेला लगवाने का प्रयास किया जाएगा। उन्होंने आरोप लगाया कि ट्रस्ट के तथाकथित सरबराहकार विपुल सेठ की ओर से पारंपरिक मेले के आयोजन में बाधा उत्पन्न की जा रही है। हालांकि, यह आरोप संबंधित पक्ष के दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

डॉ. श्रीवास्तव ने दुकानदारों से अपील की कि वे दुकानें लगाने के लिए आगे आएं। उन्होंने आश्वासन दिया कि किसी दुकानदार का नुकसान नहीं होने दिया जाएगा। साथ ही, उन्होंने कहा कि दुकानदारों की मांग पर उन्हें एक सप्ताह से लेकर 10 दिन तक का अतिरिक्त समय लिखित रूप में दिया जा सकता है।

रामलीला कमेटी ने विवाद से किया इन्कार

दूसरी ओर, रामलीला कमेटी के संयोजक विपुल सेठ ने अपनी ओर से किसी तरह का विवाद होने से इन्कार किया है। उनका कहना है कि दुकानदार खुद नुकसान की आशंका के कारण दुकानें लगाने से पीछे हट रहे हैं।

विपुल सेठ के मुताबिक, दुकानदार चाहते हैं कि नगर पालिका अतिरिक्त समय देने के संबंध में लिखित आदेश जारी करे। उनके अनुसार, इसी मांग के चलते दुकानें लगाने की प्रक्रिया में देरी हो रही है।

इस प्रकार, दोनों पक्षों के बयानों से स्पष्ट है कि फिलहाल दुकानदारों के सामने सबसे बड़ी समस्या समय को लेकर है। जब तक अतिरिक्त अवधि और दुकान लगाने की व्यवस्था स्पष्ट नहीं होती, तब तक कारोबारियों की चिंता दूर होना मुश्किल दिखाई देता है।

तीन साल से खींचतान का दावा, दुकानदारों की बढ़ी परेशानी

श्रमिक मेला दुकानदार समिति के अध्यक्ष संतोष पटवा ने दावा किया कि नगर पालिका और रामलीला कमेटी के बीच पिछले करीब तीन वर्षों से चल रही खींचतान का असर दुकानदारों पर पड़ रहा है। उनके मुताबिक, कारोबारियों को समय से दुकान लगाने के लिए जगह उपलब्ध नहीं हो पाती है। इस बार भी स्थिति स्पष्ट नहीं होने से उनकी परेशानी बढ़ गई है।

संतोष पटवा का कहना है कि धनतेरस तक ही दुकानें लगाने का प्रमुख अवसर मिलता है। यदि कारोबारियों को कम समय मिलता है, तो उनकी बिक्री प्रभावित होना तय है। ऐसे में दुकान का किराया और दूसरे खर्च निकालना भी कठिन हो सकता है।

उन्होंने मांग की कि नगर पालिका दुकानदारों को कम से कम 10 दिन का अतिरिक्त समय देने के लिए लिखित आदेश जारी करे। इससे उन्हें कारोबार करने का पर्याप्त अवसर मिलेगा और संभावित नुकसान की भरपाई करने में मदद मिल सकती है।

मेले की परंपरा बचाने के लिए समाधान जरूरी

मेले को लेकर जारी विवाद के बीच शहरवासियों का मानना है कि आपसी मतभेदों का असर वर्षों पुरानी परंपरा पर नहीं पड़ना चाहिए। उनके अनुसार, मेला केवल दुकानदारों की कमाई का माध्यम नहीं है, बल्कि यह शहर की सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।

ऐसे में नगर पालिका और रामलीला कमेटी को बातचीत के जरिए समाधान निकालना चाहिए। साथ ही, दुकानदारों को समय पर जगह उपलब्ध कराने और अतिरिक्त अवधि के संबंध में स्पष्ट निर्णय लेने की जरूरत है।

फिलहाल सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि मेले की दुकानों को लेकर असमंजस कब दूर होगा। यदि समय रहते सहमति बन जाती है, तो दुकानदारों को राहत मिल सकती है और शहरवासियों को भी मेले की रौनक का आनंद लेने का अवसर मिलेगा। वहीं, समाधान में देरी होने पर त्योहारों के इस महत्वपूर्ण कारोबारी सीजन पर असर पड़ने की आशंका बनी रहेगी।