अमेठी में गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल: तीन पीढ़ियों से मुस्लिम परिवार बना रहा रावण का पुतला
रिपोर्ट – अंजनी मिश्रा
अमेठी। उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले में गंगा-जमुनी तहजीब और आपसी भाईचारे की एक अनूठी मिसाल देखने को मिल रही है। यहां गौरीगंज के चौक बाजार में रहने वाला एक मुस्लिम परिवार पिछले तीन पीढ़ियों से दशहरा पर्व के लिए रावण का पुतला बनाता आ रहा है। धार्मिक सद्भाव, पारंपरिक कला और सामाजिक एकता का संदेश देता यह परिवार स्थानीय लोगों के बीच खास पहचान रखता है।
विजयादशमी के अवसर पर जब देशभर में बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व मनाने की तैयारियां चल रही हैं, तब निसार अहमद और उनका परिवार अपनी पारंपरिक जिम्मेदारी निभाने में जुटा है। उनके हाथों तैयार होने वाला रावण का पुतला केवल दशहरे के आयोजन का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज की साझा संस्कृति और आपसी सौहार्द का भी प्रतीक है।
तीन पीढ़ियों से रामलीला से जुड़ा है परिवार
अमेठी के जिला मुख्यालय गौरीगंज के चौक बाजार निवासी कारीगर निसार अहमद का परिवार लंबे समय से रामलीला के आयोजनों से जुड़ा हुआ है। परिवार के सदस्य रामलीला के लिए मंच तैयार करने से लेकर दशहरे पर दहन किए जाने वाले रावण के पुतले के निर्माण तक की जिम्मेदारी निभाते रहे हैं।
निसार अहमद बताते हैं कि यह काम उनके परिवार के लिए केवल आजीविका का साधन नहीं है, बल्कि उनके पूर्वजों से मिली एक पारंपरिक कला है। परिवार की तीन पीढ़ियां इस काम को आगे बढ़ा रही हैं। इसी परंपरा के चलते आज भी दशहरा आते ही परिवार के सदस्य पुतला बनाने की तैयारियों में जुट जाते हैं।
समय के साथ समाज में कई बदलाव आए हैं, लेकिन इस परिवार ने अपनी पारंपरिक कला और रामलीला से जुड़े अपने संबंध को बनाए रखा है। यही कारण है कि उनका कार्य स्थानीय स्तर पर सामाजिक समरसता की मिसाल के रूप में देखा जाता है।
10 से 15 दिन में तैयार होता है रावण का पुतला
रावण का पुतला तैयार करना मेहनत, धैर्य और कलात्मक कौशल का काम है। निसार अहमद के अनुसार, पुतले के निर्माण में लगभग 10 से 15 दिन का समय लग जाता है। इस दौरान परिवार के अन्य सदस्य भी उनका सहयोग करते हैं।
पुतला बनाने की प्रक्रिया में अलग-अलग चरणों पर ध्यान देना पड़ता है। इसके लिए समय का सही प्रबंधन और कारीगरी की समझ जरूरी होती है। दशहरे के आयोजन से पहले पुतले को निर्धारित समय पर तैयार करना भी परिवार की जिम्मेदारी का हिस्सा है।
इसके अलावा, रामलीला के मंच निर्माण से जुड़ा काम भी इस पारिवारिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। वर्षों से इस काम में लगे होने के कारण परिवार को आयोजन की आवश्यकताओं और स्थानीय परंपराओं की अच्छी जानकारी है।
हालांकि, यह कार्य मेहनत भरा है, लेकिन परिवार पीढ़ियों से मिली इस कला को आगे बढ़ाने में जुटा हुआ है। इस तरह पारंपरिक हुनर के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक जुड़ाव भी कायम बना हुआ है।
धार्मिक पहचान से ऊपर भाईचारे का संदेश
भारत की सांस्कृतिक पहचान विविधता में एकता और आपसी सम्मान की भावना से जुड़ी हुई है। अमेठी के गौरीगंज में निसार अहमद का परिवार इसी भावना को अपने काम के माध्यम से सामने ला रहा है। मुस्लिम परिवार होने के बावजूद रामलीला और दशहरे के आयोजन में उनकी भागीदारी यह दर्शाती है कि सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराएं लोगों को जोड़ने का काम करती हैं।
दरअसल, किसी भी त्योहार की वास्तविक खूबसूरती केवल उसके आयोजन तक सीमित नहीं होती, बल्कि उसमें शामिल लोगों के सहयोग और सामूहिक सहभागिता में भी दिखाई देती है। जब अलग-अलग धार्मिक और सामाजिक पृष्ठभूमि के लोग मिलकर किसी आयोजन को सफल बनाते हैं, तो आपसी विश्वास और सद्भाव की भावना मजबूत होती है।
निसार अहमद के परिवार की यह परंपरा भी इसी साझा विरासत को आगे बढ़ाती है। उनका काम बताता है कि कला और संस्कृति की कोई एक धार्मिक सीमा नहीं होती। पारंपरिक कलाएं लोगों को जोड़ने, संवाद बढ़ाने और सामाजिक संबंधों को मजबूत करने का माध्यम बन सकती हैं।
दशहरे पर रावण दहन के साथ मजबूत होगा एकता का संदेश
विजयादशमी का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। इस दिन रामलीला के समापन के बाद रावण के पुतले का दहन किया जाता है। गौरीगंज में निसार अहमद के परिवार द्वारा तैयार किया जा रहा पुतला भी इसी परंपरा का हिस्सा बनेगा।
दशहरे के अवसर पर होने वाला रावण दहन लोगों को सत्य, सदाचार और सकारात्मक मूल्यों की याद दिलाता है। वहीं, इस पुतले के निर्माण में एक मुस्लिम परिवार की तीन पीढ़ियों की भागीदारी सामाजिक एकता और साझा सांस्कृतिक विरासत का एक अलग संदेश देती है।
आज के समय में जब सामाजिक सद्भाव और आपसी विश्वास को मजबूत बनाए रखने की आवश्यकता महसूस की जाती है, तब ऐसी परंपराएं विशेष महत्व रखती हैं। ये लोगों को याद दिलाती हैं कि स्थानीय संस्कृति, कला और त्योहार समाज के विभिन्न वर्गों को एक मंच पर लाने की क्षमता रखते हैं।
परंपरा को सहेजने वाली अनूठी मिसाल
अमेठी के गौरीगंज में निसार अहमद का परिवार अपनी मेहनत और पारंपरिक कला के जरिए एक ऐसी विरासत को आगे बढ़ा रहा है, जो केवल एक परिवार तक सीमित नहीं है। तीन पीढ़ियों से रामलीला और दशहरे के आयोजन से जुड़ाव इस बात का उदाहरण है कि सांस्कृतिक परंपराएं आपसी सहयोग से लंबे समय तक जीवित रह सकती हैं।
निसार अहमद और उनके परिवार की कहानी गंगा-जमुनी तहजीब की उस भावना को सामने लाती है, जिसमें विभिन्न समुदायों के लोग एक-दूसरे की परंपराओं का सम्मान करते हुए साझा सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा बनते हैं।
इस प्रकार, अमेठी में तैयार हो रहा रावण का पुतला इस विजयादशमी पर बुराई पर अच्छाई की जीत के पारंपरिक संदेश के साथ-साथ आपसी भाईचारे, सामाजिक सौहार्द और सांस्कृतिक एकता की याद भी दिलाएगा।

