कानपुर में ₹2.66 करोड़ के इन्वेस्टमेंट फ्रॉड का खुलासा, 89 बैंक खातों में पहुंची ठगी की रकम

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रिपोर्ट – मुकेश वर्मा

कानपुर। उत्तर प्रदेश के कानपुर में निवेश के नाम पर हुई ₹2.66 करोड़ की कथित धोखाधड़ी के मामले में पुलिस की जांच के दौरान कई महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आई हैं। जाजमऊ थाने में दर्ज इस मामले में जांच एजेंसियों को ऐसे बैंक खातों और संदिग्ध लेन-देन का पता चला है, जिनके तार कई राज्यों तक फैले होने की आशंका है। प्रारंभिक जांच के अनुसार, ठगी की रकम को अलग-अलग बैंक खातों में स्थानांतरित कर उसके वास्तविक स्रोत और लाभार्थियों तक पहुंचना मुश्किल बनाने की कोशिश की गई।

पुलिस अब इस पूरे नेटवर्क की आर्थिक गतिविधियों, संदिग्ध बैंक खातों और कथित तौर पर इस्तेमाल किए गए दस्तावेजों की पड़ताल कर रही है। इसके साथ ही साइबर अपराध से जुड़े अन्य मामलों के साथ भी संभावित संबंधों की जांच की जा रही है।

89 बैंक खातों में स्थानांतरित की गई रकम

इस मामले की जांच में सामने आया है कि कथित रूप से ठगी गई धनराशि को 89 अलग-अलग बैंक खातों में स्थानांतरित किया गया। पुलिस के मुताबिक, इनमें से एक खाते में ही लगभग 25 लाख रुपये प्राप्त होने की पुष्टि हुई है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि इन खातों का संचालन कौन कर रहा था और रकम को आगे किन खातों में भेजा गया।

दरअसल, साइबर ठगी के कई मामलों में अपराधी रकम को एक खाते से दूसरे खाते में स्थानांतरित करते हैं। इस प्रक्रिया में कई मध्यवर्ती खातों का इस्तेमाल किए जाने की आशंका रहती है। इससे धनराशि के वास्तविक लाभार्थियों की पहचान करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। हालांकि, कानपुर के इस मामले में खातों के इस्तेमाल और प्रत्येक लेन-देन की भूमिका का अंतिम निर्धारण जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगा।

संदिग्ध के नाम पर करीब 35 बैंक खाते

जांच के दौरान एक प्रमुख संदिग्ध की बैंकिंग गतिविधियों की पड़ताल की गई। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उसके नाम पर करीब 35 बैंक खाते संचालित होने की बात सामने आई है। इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (एनसीआरपी) पर विभिन्न राज्यों से संबंधित 38 शिकायतें और सात आपराधिक मामले दर्ज होने की जानकारी मिली है।

इन शिकायतों और मामलों की प्रकृति तथा मौजूदा प्रकरण से उनके संबंध की पुष्टि करना जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा है। केवल शिकायत दर्ज होने से किसी व्यक्ति की दोषसिद्धि साबित नहीं होती। इसलिए पुलिस को प्रत्येक मामले में उपलब्ध साक्ष्यों, बैंकिंग रिकॉर्ड और संबंधित व्यक्तियों की भूमिका का सत्यापन करना होगा।

वहीं, कानपुर कमिश्नरेट में भी इस कथित धोखाधड़ी से संबंधित तीन अभियोग दर्ज होने की जानकारी दी गई है। पुलिस इन मामलों के बीच संभावित संबंधों की जांच कर रही है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कहीं एक ही नेटवर्क अलग-अलग लोगों को निशाना तो नहीं बना रहा था।

फर्जी दस्तावेजों से खाते खुलवाने की आशंका

प्रारंभिक जांच में यह आशंका भी सामने आई है कि बैंक खाते खुलवाने या बैंकिंग सेवाओं का इस्तेमाल करने के लिए कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों का सहारा लिया गया हो सकता है। यदि इसकी पुष्टि होती है, तो जांच में दस्तावेज तैयार करने वालों, खाताधारकों और खातों का इस्तेमाल कराने वाले अन्य लोगों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाएगी।

पुलिस यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि संबंधित खाते वास्तविक खाताधारकों ने खोले थे या किसी अन्य व्यक्ति ने उनकी पहचान और दस्तावेजों का दुरुपयोग किया। इसके लिए बैंक खातों से जुड़े केवाईसी रिकॉर्ड, मोबाइल नंबर, लेन-देन का विवरण और अन्य डिजिटल साक्ष्यों की जांच की जा सकती है।

इसके अलावा, यह भी पता लगाया जा रहा है कि निवेश के नाम पर लोगों से संपर्क किस माध्यम से किया गया था। कथित निवेश योजना, उससे जुड़े व्यक्तियों और धनराशि के प्रवाह की जानकारी सामने आने के बाद धोखाधड़ी के तरीके को बेहतर ढंग से समझा जा सकेगा।

दो दिनों में ₹3.24 करोड़ का संदिग्ध लेन-देन

इस मामले में एक और महत्वपूर्ण तथ्य संदिग्ध खातों से हुए लेन-देन से जुड़ा है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, 5 और 8 अगस्त को संदिग्ध खातों से लगभग ₹3.24 करोड़ का लेन-देन हुआ। पुलिस इस धनराशि के स्रोत, प्राप्तकर्ताओं और संबंधित बैंक खातों की भूमिका की जांच कर रही है।

यहां ध्यान देने वाली बात है कि संदिग्ध खातों से हुए कुल लेन-देन और इस मामले में बताई गई ₹2.66 करोड़ की कथित ठगी की रकम अलग-अलग आंकड़े हैं। इसलिए दोनों राशियों को एक ही धनराशि मानना उचित नहीं होगा। जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा कि इन लेन-देन में कितनी रकम इस प्रकरण से संबंधित थी और कितनी अन्य गतिविधियों से जुड़ी हो सकती है।

साइबर सेल ने करीब ₹30 लाख कराए होल्ड

पुलिस और साइबर सेल की कार्रवाई के दौरान अब तक लगभग ₹30 लाख की धनराशि होल्ड कराए जाने की जानकारी सामने आई है। यह कार्रवाई कथित ठगी की रकम को आगे स्थानांतरित होने से रोकने के उद्देश्य से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

हालांकि, किसी रकम को होल्ड कराया जाना और उसे पीड़ितों को वापस दिलाया जाना अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। धनराशि की वापसी के लिए संबंधित बैंक खातों, कानूनी प्रक्रिया और दावों का सत्यापन आवश्यक हो सकता है। ऐसे में पीड़ितों को पुलिस और साइबर अपराध से जुड़े आधिकारिक माध्यमों के संपर्क में बने रहना चाहिए।

APK फाइल स्कैम और डिजिटल अरेस्ट से संभावित कनेक्शन की जांच

पुलिस की विशेष टीमें इस मामले में दूसरे स्तर के बैंक खातों और अन्य संभावित लाभार्थियों की पहचान करने में जुटी हैं। इसके साथ ही जांच एजेंसियां इस संभावना की भी पड़ताल कर रही हैं कि कथित नेटवर्क का संबंध एपीके (APK) फाइल के जरिए होने वाली साइबर ठगी या डिजिटल अरेस्ट जैसी धोखाधड़ी से तो नहीं है।

एपीके फाइल के माध्यम से होने वाले साइबर अपराधों में लोगों को संदिग्ध एप्लिकेशन डाउनलोड करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। कुछ मामलों में ऐसे एप्लिकेशन मोबाइल की संवेदनशील जानकारी तक पहुंच बनाने का माध्यम बनते हैं। दूसरी ओर, डिजिटल अरेस्ट के नाम पर ठग खुद को पुलिस या अन्य सरकारी एजेंसियों का अधिकारी बताकर लोगों पर दबाव डालते हैं और उनसे धनराशि हस्तांतरित करवाने की कोशिश करते हैं।

फिलहाल, इन तरीकों और कानपुर के निवेश धोखाधड़ी मामले के बीच किसी संबंध की पुष्टि नहीं हुई है। पुलिस सभी संभावित पहलुओं को ध्यान में रखकर जांच आगे बढ़ा रही है।

गिरोह के अन्य सदस्यों की तलाश में पुलिस

पुलिस के अनुसार, इस मामले में अन्य संदिग्धों की पहचान करने की कार्रवाई आगे बढ़ाई गई है और संभावित ठिकानों पर दबिश दी जा रही है। जांच का उद्देश्य कथित नेटवर्क में शामिल लोगों की भूमिका स्पष्ट करना, धनराशि के प्रवाह का पता लगाना और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कानूनी कार्रवाई करना है।

कुल मिलाकर, कानपुर का यह मामला निवेश के नाम पर होने वाली धोखाधड़ी और बैंक खातों के संभावित दुरुपयोग की गंभीरता को सामने लाता है। ऐसे में आम लोगों को किसी भी निवेश योजना में पैसा लगाने से पहले संबंधित संस्था और उसके पंजीकरण की जांच करनी चाहिए। असामान्य रूप से अधिक मुनाफे का वादा करने वाली योजनाओं से सावधान रहना भी जरूरी है।

यदि किसी व्यक्ति के साथ ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी होती है, तो उसे जल्द से जल्द साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 पर सूचना देनी चाहिए और आधिकारिक पोर्टल cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज करनी चाहिए। समय पर शिकायत मिलने से संबंधित खातों में उपलब्ध धनराशि को रोकने की संभावना बढ़ सकती है।

 

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