लखीमपुर खीरी में राष्ट्रकवि भोलानाथ शेखर की 114वीं जयंती मनाई गई, काव्य गोष्ठी में साहित्यकारों ने दी श्रद्धांजलि
रिपोर्ट – शरद अवस्थी
लखीमपुर खीरी: राष्ट्रकवि, साहित्यकार और ओजस्वी कवि स्वर्गीय भोलानाथ शेखर की 114वीं जयंती पर लखीमपुर खीरी स्थित उनके निज निवास, मोहल्ला नई बस्ती में काव्य एवं विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर परिवार के सदस्यों और साहित्यकारों ने उनके चित्र पर माल्यार्पण कर श्रद्धासुमन अर्पित किए। साथ ही दीप प्रज्वलन के साथ कार्यक्रम की शुरुआत हुई। गोष्ठी में कवि भोलानाथ शेखर के साहित्यिक योगदान, राष्ट्रप्रेम, भारतीय संस्कृति के प्रति समर्पण और हिंदी साहित्य में उनके स्थान को याद किया गया।
भोलानाथ शेखर का जन्म 13 अक्टूबर 1912 को हुआ था, जबकि 13 अक्टूबर 1965 को उनका निधन हुआ। उनकी स्मृति में आयोजित इस कार्यक्रम में परिवारजनों और साहित्य प्रेमियों ने उनकी रचनाओं का पाठ किया। वक्ताओं ने कहा कि उनकी लेखनी में राष्ट्रप्रेम, सांस्कृतिक चेतना और ओजपूर्ण अभिव्यक्ति का विशेष स्थान था। उनकी रचनाएं आज भी साहित्य प्रेमियों को प्रेरित करती हैं।
भारतीय संस्कृति और राष्ट्रप्रेम को समर्पित रहा साहित्य
कवि भोलानाथ शेखर को हिंदी और अवधी साहित्य जगत में उनकी रचनात्मक पहचान के लिए याद किया जाता है। वे भारतीय संस्कृति के अनन्य उपासक और ओजस्वी काव्य रचना के लिए प्रसिद्ध थे। उनकी चर्चित पुस्तक ‘तलवार चली’ का भी कार्यक्रम के दौरान उल्लेख किया गया। साहित्यकारों ने कहा कि उन्होंने अपनी कलम के माध्यम से देश, समाज और सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़े विचारों को अभिव्यक्ति दी।
इस अवसर पर प्रस्तुत कविताओं और विचारों में राष्ट्रप्रेम, सामाजिक संवेदना, पारिवारिक रिश्तों और भारतीय नारी के सम्मान जैसे विषय प्रमुख रहे। कार्यक्रम का उद्देश्य नई पीढ़ी को उनके साहित्यिक योगदान से परिचित कराना और उनकी स्मृतियों को जीवंत बनाए रखना रहा।
साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं से बांधा समां
काव्य गोष्ठी में प्रसिद्ध गीतकार राजेंद्र प्रसाद तिवारी ‘कंटक’ ने अपनी रचना की पंक्तियां प्रस्तुत कीं—“जितनी दूर हुए तुम मुझसे, उतनी याद आई तुम्हारी।” उनकी प्रस्तुति ने श्रोताओं को भावनात्मक रूप से जोड़ा।
वहीं, व्यंग्यकार कमलेश धुरेंद्र ने कवि सम्मेलन से संबंधित पंक्तियां सुनाईं। इसके बाद कृष्णा चंद्रशेखरन ने ‘तलवार चली’ पुस्तक से जुड़ी रचना के माध्यम से देश की परंपरा, अखंडता और सुख-समृद्धि की कामना व्यक्त की। उनकी कविता में राष्ट्रीय एकता और आदर्श समाज की भावना दिखाई दी।
शिक्षक आशीष मिश्रा ने मानवीय संवेदनाओं पर आधारित गीत प्रस्तुत किया। उनकी पंक्तियां थीं—“दुखी के काम जो आए उसे इंसान कहते हैं, पराया दर्द जो अपनाए उसे इंसान कहते हैं।” इस रचना के माध्यम से उन्होंने दूसरों के दुख को समझने और जरूरतमंदों की मदद करने का संदेश दिया।
इसी क्रम में सुप्रसिद्ध शायर विकास सहाय ने गजल प्रस्तुत की। उनकी पंक्तियों में संघर्ष, थकान और जीवन के अनुभवों को शब्द दिए गए। इस तरह कार्यक्रम में गीत, कविता, व्यंग्य और गजल के माध्यम से साहित्य की विविध विधाओं का संगम देखने को मिला।
परिवार की नई पीढ़ी ने भी किया काव्य पाठ
समारोह की एक खास बात यह रही कि भोलानाथ शेखर के परिवार की नई पीढ़ी ने भी साहित्यिक परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अपनी रचनाएं प्रस्तुत कीं। उनके पौत्र एडवोकेट रजत शेखर ने मां दुर्गा के स्वरूप और शक्ति से जुड़ी ओजपूर्ण पंक्तियां सुनाईं। उनकी प्रस्तुति में देवी शक्ति और राष्ट्ररक्षा की भावना प्रमुख रही।
वहीं, उनकी परपोती एडवोकेट भूमि शेखर ने ‘भारतीय नारी’ शीर्षक से अपनी कविता के अंश प्रस्तुत किए। उन्होंने अपनी रचना में नारी के सम्मान, साहस, त्याग और राष्ट्र निर्माण में उसकी भूमिका को रेखांकित किया। कविता में रानी लक्ष्मीबाई और देश के वीरों का उल्लेख करते हुए भारतीय नारी की शक्ति का वर्णन किया गया।
इसके अतिरिक्त पौत्र युवराज शेखर ने पिता और पुत्री के भावनात्मक रिश्ते पर आधारित पंक्तियां प्रस्तुत कीं। उनकी रचना में बेटी के मन की भावनाओं और पिता के प्रति उसके लगाव को अभिव्यक्त किया गया। परिवार के सदस्यों की इन प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम को भावनात्मक और साहित्यिक स्वरूप प्रदान किया।
13 अक्टूबर 1965 की घटना को किया याद
कार्यक्रम के दौरान परिवार के सदस्यों ने 13 अक्टूबर 1965 से जुड़ी स्मृतियां साझा कीं। परिवार की ओर से बताया गया कि उस दिन करवाचौथ का पर्व था। भोलानाथ शेखर की पत्नी शांति देवी शेखर व्रत रखकर उनका इंतजार कर रही थीं। इसी बीच उनके निधन का दुखद समाचार मिला।
परिजनों के अनुसार, उसी दिन लखीमपुर खीरी नगर पालिका परिषद की ओर से दशहरे मेले के अंतर्गत आयोजित ऐतिहासिक अखिल भारतीय राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में देशभर से आए कवि अपनी रचनाएं प्रस्तुत कर रहे थे। सम्मेलन का संचालन राष्ट्रकवि डॉ. बृजेंद्र अवस्थी कर रहे थे।
कार्यक्रम में भोलानाथ शेखर ने अपने पौत्र के मुख से उनकी रचना की पंक्तियां सुनाने की अनुमति मांगी थी। इसके बाद उनके पौत्र ने बाल स्वर में “नन्हा-मुन्ना राही हूं, देश का सिपाही हूं” पंक्तियां प्रस्तुत कीं। परिवार द्वारा साझा किए गए संस्मरण के अनुसार, इस प्रस्तुति के बाद भोलानाथ शेखर ने डॉ. बृजेंद्र अवस्थी के कंधे पर सिर झुकाते हुए अंतिम सांस ली।
इस घटना से परिवार के साथ साहित्य जगत और उपस्थित लोगों में शोक की लहर दौड़ गई थी। परिजनों ने बताया कि उस समय के तत्कालीन विधायक कमाल अहमद रिजवी ने उनके निधन के बाद दशहरे मेले के शेष आयोजनों को रुकवा दिया था।
साहित्यिक विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प
परिवार के मुखिया रामगोपाल शेखर ने कहा कि 13 अक्टूबर का दिन उनके परिवार के लिए हमेशा स्मरणीय रहेगा। उन्होंने अपने माता-पिता की तपस्या और साधना को परिवार की उपलब्धियों का आधार बताया। परिवार के सदस्यों ने भोलानाथ शेखर की साहित्यिक विरासत को सहेजने और उनकी रचनाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
कार्यक्रम का संचालन एडवोकेट रजत शेखर ने किया। इस दौरान विष्णु गोपाल शेखर, श्रीमती कमलेश शेखर, रोली शेखर सहित परिवार के अन्य सदस्य मौजूद रहे। आयोजन के अंत में साहित्यकारों को अंगवस्त्र और स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया गया।
समारोह में वक्ताओं ने कहा कि कवि भोलानाथ शेखर की स्मृति को जीवंत रखने के लिए साहित्यिक आयोजनों को निरंतर जारी रखना महत्वपूर्ण है। उनके जीवन और रचनाओं से राष्ट्रप्रेम, सामाजिक संवेदना तथा सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति समर्पण की प्रेरणा मिलती है। इस प्रकार उनकी 114वीं जयंती पर आयोजित काव्य एवं विचार गोष्ठी साहित्य के प्रति सम्मान और पारिवारिक विरासत को संजोने का अवसर बनी।

