कानपुर में 90 वर्षीय महिला की पित्त की नली से निकाली बड़ी पथरी, स्पाई ग्लास तकनीक से हुआ इलाज
रिपोर्ट – हरी शंकर शर्मा
कानपुर: चिकित्सा क्षेत्र में आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से जटिल बीमारियों का उपचार आसान हो रहा है। इसी क्रम में कानपुर के जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज से संबद्ध जीएसवीएसपीजीआई के गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग में 90 वर्षीय बुजुर्ग महिला की पित्त की नली में फंसी बड़ी पथरी को बिना बड़े ऑपरेशन के निकालने में सफलता मिली है। स्पाई ग्लास इण्डोस्कोपी और इलेक्ट्रो हाइड्रोलिक लिथोट्रिप्सी तकनीक की मदद से पथरी को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ा गया। इसके बाद ईआरसीपी प्रक्रिया के माध्यम से पित्त की नली को साफ किया गया। संस्थान के अनुसार, उपचार के बाद महिला की स्थिति में तेजी से सुधार हो रहा है।
पेट दर्द, पीलिया और बुखार से परेशान थी महिला
जानकारी के मुताबिक, 90 वर्षीय महिला पेट में दर्द और पीलिया की समस्या से पीड़ित थीं। इसके साथ ही उन्हें पिछले कई दिनों से तेज ठंड लगने के साथ बुखार भी आ रहा था। इन लक्षणों के कारण परिजन उन्हें जीएसवीएसपीजीआई, कानपुर के गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग में लेकर पहुंचे।
यहां विभागाध्यक्ष डॉ. विनय कुमार ने मरीज की स्थिति का आकलन किया। बुजुर्ग महिला की उम्र और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को देखते हुए उन्हें सोमवार को भर्ती कर लिया गया। इसके बाद आवश्यक जांचें कराई गईं। जांच में सामने आया कि महिला की पित्त की नली में लगभग दो सेंटीमीटर की बड़ी पथरी फंसी हुई थी।
पथरी के कारण पित्त के प्रवाह में रुकावट पैदा हो रही थी। साथ ही, मरीज में पीलिया और पित्त की नली में संक्रमण से जुड़ी गंभीर समस्या के संकेत मिले। ऐसे में समय पर उपचार करना जरूरी था।
अधिक उम्र के कारण बड़े ऑपरेशन से बचने का निर्णय
मरीज की उम्र लगभग 90 वर्ष होने के कारण चिकित्सकों के सामने उपचार की चुनौती थी। सामान्य ऑपरेशन के जोखिम को ध्यान में रखते हुए डॉक्टरों ने ऐसी तकनीक से इलाज करने का निर्णय लिया, जिसमें बड़े चीरे की आवश्यकता नहीं होती।
चिकित्सकों ने स्पाई ग्लास इण्डोस्कोपी, इलेक्ट्रो हाइड्रोलिक लिथोट्रिप्सी और ईआरसीपी की सहायता से पथरी निकालने की योजना बनाई। इस प्रक्रिया का उद्देश्य पित्त की नली में फंसी पथरी को छोटे टुकड़ों में तोड़कर बाहर निकालना और नली को साफ करना था।
इसके बाद बुधवार को विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम ने यह प्रक्रिया पूरी की। संस्थान से मिली जानकारी के अनुसार, पूरी प्रक्रिया में लगभग 30 मिनट लगे। उपचार के बाद मरीज की स्थिति में तेजी से सुधार होने की जानकारी दी गई है।
डॉ. विनय कुमार की टीम ने पूरी की प्रक्रिया
इस जटिल प्रक्रिया को गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. विनय कुमार के नेतृत्व में अंजाम दिया गया। टीम में डॉ. ध्रुव ठाकुर और डॉ. सत्यम कुमार सिंह भी शामिल रहे।
चिकित्सकों ने स्पाई ग्लास इण्डोस्कोप की सहायता से पित्त की नली के अंदर फंसी पथरी को देखा। इसके बाद इलेक्ट्रो हाइड्रोलिक लिथोट्रिप्सी तकनीक से बड़ी पथरी को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ा गया। अंत में ईआरसीपी विधि के माध्यम से पित्त की नली को साफ किया गया।
इस तरह मरीज को बड़े ऑपरेशन से बचाते हुए उपचार किया गया। हालांकि, किसी भी चिकित्सा प्रक्रिया की उपयुक्तता मरीज की उम्र, स्वास्थ्य, जांच रिपोर्ट और चिकित्सकीय आकलन पर निर्भर करती है।
क्या है स्पाई ग्लास इण्डोस्कोपी तकनीक?
स्पाई ग्लास इण्डोस्कोपी एक विशेष चिकित्सा तकनीक है, जिसमें बेहद पतली और लचीली ट्यूब के सिरे पर कैमरा लगा होता है। इसकी मदद से चिकित्सक पित्त की नली के अंदरूनी हिस्से को सीधे देख सकते हैं। इससे पथरी की स्थिति, आकार और नली में मौजूद दूसरी असामान्यताओं का पता लगाने में मदद मिलती है।
पित्त की नली में फंसी पथरी के मामलों में यह तकनीक खास तौर पर उपयोगी हो सकती है। जब पथरी बड़ी हो और सामान्य तरीकों से निकालना मुश्किल हो, तब चिकित्सक स्थिति के अनुसार विशेष उपकरणों की सहायता से उसे छोटे टुकड़ों में तोड़ सकते हैं।
स्पाई ग्लास तकनीक का उपयोग ईआरसीपी के साथ भी किया जा सकता है। इससे पथरी को देखने और उसके उपचार की प्रक्रिया में चिकित्सकों को अधिक स्पष्ट जानकारी मिलती है।
क्या है ईआरसीपी और इलेक्ट्रो हाइड्रोलिक लिथोट्रिप्सी?
ईआरसीपी यानी एंडोस्कोपिक रेट्रोग्रेड कोलैंगियोपैंक्रिएटोग्राफी एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसका इस्तेमाल पित्त और अग्न्याशय की नलिकाओं से जुड़ी कुछ समस्याओं की जांच और उपचार के लिए किया जाता है। इसमें मुंह के रास्ते एक विशेष एंडोस्कोप पाचन तंत्र तक पहुंचाया जाता है। जरूरत के अनुसार उपकरणों की मदद से पित्त की नली में फंसी पथरी निकालने या नली की रुकावट दूर करने का प्रयास किया जाता है।
वहीं, इलेक्ट्रो हाइड्रोलिक लिथोट्रिप्सी में विशेष उपकरण से ऊर्जा उत्पन्न कर पथरी को छोटे टुकड़ों में तोड़ा जाता है। इससे कुछ ऐसे मामलों में पथरी निकालने में मदद मिल सकती है, जिनमें उसका आकार या स्थिति उपचार को कठिन बना देती है।
हालांकि, इन तकनीकों का इस्तेमाल हर मरीज में जरूरी या उपयुक्त नहीं होता। उपचार का निर्णय विशेषज्ञ चिकित्सक मरीज की स्थिति के अनुसार लेते हैं।
पित्त की नली की बीमारी में उपयोगी है गैस्ट्रोएंटरोलॉजी
गैस्ट्रोएंटरोलॉजी पाचन तंत्र और उससे जुड़े अंगों की बीमारियों के निदान एवं उपचार से संबंधित चिकित्सा विशेषज्ञता है। डॉ. विनय कुमार के अनुसार, स्पाई ग्लास इण्डोस्कोपी का इस्तेमाल पित्त की नली में फंसी पथरी का पता लगाने और उसे निकालने में किया जा सकता है।
इसके अलावा, पित्त की नली में संकुचन या रुकावट के कारणों का पता लगाने, जरूरत पड़ने पर स्टेंट लगाने और कुछ मामलों में ऊतक का नमूना यानी बायोप्सी लेने में भी यह तकनीक उपयोगी हो सकती है। पित्त की नली के कैंसर या ट्यूमर से जुड़े कुछ मामलों में भी इसकी मदद से अंदरूनी स्थिति का आकलन किया जा सकता है।
प्राचार्य ने चिकित्सकीय टीम को दी बधाई
90 वर्षीय महिला के उपचार में मिली सफलता पर संस्थान के प्राचार्य डॉ. संजय काला ने गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग की पूरी टीम को बधाई दी। उन्होंने इस जटिल प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए चिकित्सकों के प्रयासों की सराहना की।
कानपुर में यह मामला आधुनिक एंडोस्कोपिक तकनीकों के उपयोग का उदाहरण है। खासकर अधिक उम्र के उन मरीजों में, जिनके लिए बड़े ऑपरेशन का जोखिम अधिक हो सकता है, जांच और उपचार के विकल्पों का विशेषज्ञों द्वारा सावधानीपूर्वक आकलन महत्वपूर्ण होता है। फिलहाल, संस्थान के अनुसार बुजुर्ग महिला की स्थिति में सुधार हो रहा है।

