सोनभद्र: स्थायी लोक अदालत के हस्तक्षेप से रिटायर्ड कर्मचारी को मिला न्याय, बीमा कंपनी ने दिया 1.55 लाख का चेक
रिपोर्ट: ज्ञान प्रकाश चतुर्वेदी
सोनभद्र। बीमा राशि के भुगतान के लिए महीनों तक इंतजार करने के बाद सेवानिवृत्त कर्मचारी कैलाश नाथ पाठक को आखिरकार राहत मिली है। स्थायी लोक अदालत के हस्तक्षेप के बाद यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी ने उन्हें ब्याज सहित 1,55,940 रुपये का चेक सौंपा। राबर्ट्सगंज कचहरी परिसर स्थित एडीआर भवन में मंगलवार को यह भुगतान किया गया। बीमा दावे की बकाया राशि को लेकर चल रहा विवाद करीब पांच महीने बाद सुलझा।
यह मामला उन लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण है, जिन्हें बीमा कंपनियों से दावा राशि प्राप्त करने में परेशानी का सामना करना पड़ता है। ऐसे मामलों में संबंधित कानूनी प्रक्रिया और उपलब्ध शिकायत निवारण व्यवस्थाओं की जानकारी होने से उपभोक्ताओं को राहत मिल सकती है। कैलाश नाथ पाठक के मामले में भी जब पत्राचार और अन्य प्रयासों के बावजूद संतोषजनक समाधान नहीं हुआ, तब उन्होंने स्थायी लोक अदालत का सहारा लिया।
पत्नी के इलाज के खर्च से जुड़ा था बीमा दावा
प्राप्त जानकारी के अनुसार, राबर्ट्सगंज कोतवाली क्षेत्र के विकास नगर निवासी कैलाश नाथ पाठक, स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद पाठक के पुत्र हैं। उन्होंने यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी से 10 लाख रुपये का बीमा कराया था। बीमा की अवधि 11 मार्च 2022 से 10 मार्च 2023 तक निर्धारित थी।
इसी अवधि के दौरान उनकी पत्नी की तबीयत खराब हो गई। इसके बाद पत्नी के इलाज पर हुए खर्च के भुगतान के लिए उन्होंने बीमा कंपनी के समक्ष दावा प्रस्तुत किया। कैलाश नाथ पाठक के अनुसार, कंपनी की ओर से दावे की पूरी धनराशि का भुगतान नहीं किया गया। परिणामस्वरूप, उन्हें इलाज से संबंधित 1,49,152 रुपये अपनी जेब से खर्च करने पड़े।
बीमा कराने का उद्देश्य जरूरत के समय आर्थिक सहायता प्राप्त करना होता है। हालांकि, जब दावा राशि का भुगतान अपेक्षा के अनुरूप नहीं हो पाता, तो संबंधित व्यक्ति और उसके परिवार को आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। कैलाश नाथ पाठक ने भी बकाया राशि प्राप्त करने के लिए लगातार प्रयास किए।
पत्र भेजने और आरटीआई के बाद भी नहीं मिला संतोषजनक जवाब
बीमा राशि के भुगतान का मामला सुलझाने के लिए कैलाश नाथ पाठक ने पहले बीमा कंपनी से संपर्क किया। उन्होंने बकाया धनराशि के संबंध में कंपनी को रजिस्टर्ड डाक से पत्र भेजा। इसके अतिरिक्त, उन्होंने सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत भी जानकारी मांगी।
हालांकि, उनके अनुसार इन प्रयासों के बावजूद उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिला। ऐसे में बीमा राशि प्राप्त करने का मामला लंबे समय तक लंबित रहा। जब संबंधित स्तर पर समस्या का समाधान नहीं हुआ, तब उन्होंने न्याय पाने के लिए स्थायी लोक अदालत का दरवाजा खटखटाया।
इस कदम के बाद मामले में आगे की कार्रवाई हुई। स्थायी लोक अदालत के हस्तक्षेप से बीमा कंपनी और शिकायतकर्ता के बीच भुगतान से संबंधित विवाद का निस्तारण हो सका। इसके बाद कंपनी ने ब्याज सहित कुल 1,55,940 रुपये का चेक कैलाश नाथ पाठक को सौंप दिया।
स्थायी लोक अदालत की भूमिका से सुलझा मामला
राबर्ट्सगंज कचहरी परिसर स्थित एडीआर भवन में मंगलवार को कैलाश नाथ पाठक को चेक प्रदान किया गया। इस तरह बीमा राशि के भुगतान से संबंधित उनका मामला निस्तारित हुआ। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, भुगतान में मूल बकाया राशि के साथ ब्याज भी शामिल था।
यह घटनाक्रम बताता है कि जनोपयोगी सेवाओं से जुड़े कुछ विवादों में स्थायी लोक अदालत एक महत्वपूर्ण विकल्प साबित हो सकती है। हालांकि, प्रत्येक मामले की परिस्थितियां अलग होती हैं और समाधान संबंधित तथ्यों, लागू नियमों तथा कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करता है।
बीमा उपभोक्ताओं के लिए जरूरी है कि वे अपनी पॉलिसी की शर्तों, दावा प्रस्तुत करने की प्रक्रिया और भुगतान से संबंधित दस्तावेजों को सुरक्षित रखें। यदि दावे के निस्तारण में समस्या आती है, तो सबसे पहले बीमा कंपनी के समक्ष लिखित शिकायत दर्ज कराना उपयोगी हो सकता है। इसके बाद भी समाधान नहीं मिलने पर मामले की प्रकृति के अनुसार उपलब्ध शिकायत निवारण और कानूनी विकल्पों की जानकारी ली जा सकती है।
जनोपयोगी सेवाओं के विवादों में भी मिल सकती है राहत
स्थायी लोक अदालत के अध्यक्ष नरेंद्र बहादुर प्रसाद ने बताया कि बिजली, पानी, अस्पताल, परिवहन, बीमा, शिक्षा, डाक और नगर पालिका जैसी जनोपयोगी सेवाओं से जुड़े मामलों का निस्तारण बिना कोर्ट फीस के कराया जा सकता है।
उन्होंने बताया कि इस व्यवस्था के माध्यम से पात्र मामलों में संबंधित पक्षों को विवाद का समाधान प्राप्त करने का अवसर मिलता है। इससे आम नागरिकों को अपनी शिकायत के निस्तारण के लिए उपलब्ध कानूनी मंच की जानकारी मिलती है।
वहीं, स्थायी लोक अदालत के सदस्य नीरज सिंह ने लोगों से अपील की कि वे जनोपयोगी सेवाओं से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए इस सुविधा का लाभ उठाएं। उन्होंने इस व्यवस्था के प्रति जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
कार्यक्रम के दौरान सदस्य आशीष मिश्रा, अधिवक्ता आशुतोष पाठक और बीमा कंपनी के अधिवक्ता ओमप्रकाश त्रिपाठी सहित अन्य लोग मौजूद रहे।
उपभोक्ताओं के लिए क्या है इस मामले का संदेश?
कैलाश नाथ पाठक का मामला उन उपभोक्ताओं के लिए उपयोगी उदाहरण है, जिन्हें बीमा दावे के भुगतान में कठिनाई होती है। इससे यह सीख मिलती है कि शिकायत के समाधान के लिए संबंधित दस्तावेजों और पत्राचार का रिकॉर्ड रखना महत्वपूर्ण है। साथ ही, केवल मौखिक बातचीत पर निर्भर रहने के बजाय लिखित शिकायत और उसके जवाब को सुरक्षित रखना भी उपयोगी होता है।
यदि बीमा कंपनी की ओर से दावा अस्वीकार किया जाता है या भुगतान को लेकर विवाद उत्पन्न होता है, तो उपभोक्ता को पॉलिसी की शर्तों और कंपनी के निर्णय की जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। इसके बाद उपलब्ध शिकायत निवारण व्यवस्था के माध्यम से उचित कार्रवाई की जा सकती है।
सोनभद्र में स्थायी लोक अदालत के हस्तक्षेप से कैलाश नाथ पाठक को ब्याज सहित 1,55,940 रुपये का चेक मिलना इसी प्रक्रिया का एक उदाहरण है। करीब पांच महीने तक चले इंतजार के बाद बीमा राशि के भुगतान से जुड़ा विवाद समाप्त हुआ और सेवानिवृत्त कर्मचारी को राहत मिली।

